आपदा को बदला अवसर में, कोरोना काल में महिलाओं ने कोसाफल व सब्जी उत्पादन का नया काम शुरू कर कमाए पौने दो लाख


रायपुर. वैश्विक महामारी कोरोना ने देश-दुनिया की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ लोगों की आजीविका को भी काफी नुकसान पहुँचाया है। एक तरफ लॉक-डाउन में जहाँ रोजगार-धंधों पर संकट छाया, तो वहीं अनलॉक होने के बाद भी लोगों को उनकी क्षमता के अनुरुप काम नहीं मिल रहा है। इन सब के बावजूद हमारे बीच ऐसे कई उदाहरण हैं जहां लोगों ने कोरोना महामारी जैसी आपदा को अवसर में बदला है और खुद के साथ-साथ दूसरे लोगों की आजीविका के लिए भी नए रास्ते बनाएँ हैं। जांजगीर-चांपा जिले के महुदा (च) की मां कंकाली स्वसहायता समूह की महिलाओं ने भी लॉक-डाउन के बीच रोजगार के नए अवसर तलाशे और अपने मजबूत इरादों व दृढ़ इच्छाशक्ति से इसे सफल भी बनाया। उन्होंने रेशम विभाग द्वारा मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) से लगाए गए अर्जुन के पेड़ों पर कोसाफल का उत्पादन और सब्जी की अंतरवर्ती खेती कर कुछ ही महीनों में करीब पौने दो लाख रूपए कमाएं हैं।


कोसे के कपड़ों के लिए प्रसिद्ध जाँजगीर-चाम्पा जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर दूर स्थित  ग्राम पंचायत महुदा (च) की माँ कंकाली महिला स्वसहायता समूह इस साल जुलाई से वहां मनरेगा से लगाए गए अर्जुन के वृक्षों पर कृमिपालन एवं कोसाफल उत्पादन का काम कर रही हैं। समूह की महिलाओं ने कोरोना काल की विषम परिस्थितियों में रेशम विभाग से इस काम का प्रशिक्षण हासिल किया है। अपने आत्म-विश्वास और डेढ़ महीने की कड़ी मेहनत व लगन के दम पर पहली फसल के रूप में उन्होंने 35 हजार कोसाफल का उत्पादन लिया। इन्हें स्थानीय व्यापारियों को दो रूपए प्रति कोसाफल के हिसाब से बेचकर 70 हजार रूपए की कमाई की। साथ ही वे अर्जुन वृक्षारोपण वाले प्रक्षेत्र के एक हिस्से में आलू, टमाटर, प्याज, लहसुन, मक्का, मूंग, पालक, लालभाजी, धनिया, मिर्ची और पपीता की खेती कर आसपास के बाजारों में बेच रही हैं। इस काम से उन्हें एक लाख रूपए से अधिक की आमदनी हो चुकी है।

कंकाली स्वसहायता समूह की अध्यक्ष श्रीमती शांति बाई बताती हैं कि लॉक-डाउन में सब काम बंद हो गया था। गांव में मनरेगा के अंतर्गत लगाए गए अर्जुन के पेड़ों के बीच की खाली जगह को देखकर ध्यान आया कि इसमें हम सब्जी की खेती कर सकते हैं। वह कहती हैं कि कोरोना काल की शुरूआत में साप्ताहिक बाजारों पर रोक होने के कारण सब्जियों के दाम लगातार बढ़ रहे थे। ऐसे में गांव के गरीब लोगों को सब्जियां खरीदने में काफी दिक्कत हो रही थी। समूह द्वारा उत्पादित साग-सब्जियों से लोगों को बहुत राहत मिली।

मनरेगा बनी आजीविका का आधार

महुदा (च) की जिस 25 एकड़ जमीन में अभी कोसाफल का उत्पादन हो रहा है, वह चार पहले वीरान और अनुपयोगी था। ग्राम पंचायत की पहल पर रेशम विभाग ने मनरेगा के तहत छह लाख 66 हजार रुपए की लागत से वहां टसर पौधरोपण किया। इसमें गांव के 73 मनरेगा जॉबकार्डधारी परिवारों ने काम कर 41 हजार पौधों का रोपण किया था। इसके एवज में श्रमिकों को पौने चार लाख रूपए से अधिक का मजदूरी भुगतान किया गया। वहां रोपे गए पौधों के संधारण के लिए रेशम विभाग द्वारा रेशम विकास एवं विस्तार योजना के अभिसरण से करीब साढ़े 11 लाख रूपए स्वीकृत किए गए। चार सालों में अब अर्जुन के पौधे छह से आठ फीट के हरे-भरे पेड़ बन गए हैं।

कंकाली स्वसहायता समूह से जुड़े 23 महिलाओं को कोसाफल उत्पादन से रोजगार मिल रहा है। मनरेगा से टसर पौधरोपण के दौरान जिन महिलाओं ने काम किया था और जिन्हें कोसाफल उत्पादन के काम में रूचि थीं, ऐसी 23 महिलाओं का एक समूह बनाकर कृमिपालन का 15 दिनों का विशेष प्रशिक्षण दिया गया। अब ये महिलाएँ कोसाफल उत्पादन में पारंगत हो गई हैं और उन्होंने इस काम को अपनी आजीविका के रूप में अपना लिया है। ये महिलाएं अपने घर-परिवार की माली हालत सुधारने के साथ गांव की अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करने में अपना योगदान दे रही हैं।

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