ईरानी हमले का 11,000 KM दूर अमेरिकी खुफिया एजेंसी ने पहले ही पता कैसे लगा लिया?
ईरानी मीडिया ने दावा किया है कि इराक के भीतर अमेरिकी बेस पर उसके हमले में 80 लोग मारे गए हैं. इराक में इरबिल और अल-असद मिलिट्री बेस पर अमेरिका के सैनिक मौजूद थे. लेकिन किसी भी अमेरिकी सैनिक के घायल होने की फिलहाल खबर नहीं है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा भी कि सब कुछ ठीक है. हमारे सभी सैनिक सुरक्षित हैं. अमेरिकी मीडिया के मुताबिक अमेरिका के सैनिकों को ईरान का मिसाइल हमला शुरू होते ही उसकी जानकारी मिल गई थी.
दरअसल इराक से करीब 11 हजार किलोमीटर दूर अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (National Security Agency) यानी NSA नामक खुफिया एजेंसी ने मिसाइलों का पता लगा लिया था. NSA दुनिया भर में जासूसी उपकरणों, सर्विलांस विमानों और सैटेलाइट की मदद से अमेरिका के दुश्मनों पर नजर रखती है. NSA की मदद से ही इराक में अमेरिकी सैनिकों को चेतावनी मिल रही थी. यानी उन अमेरिकी सैनिकों को पता था कि ईरान ने उन्हें निशाना बनाकर मिसाइलें लॉन्च की हैं और वो मिसाइल कितनी देर बाद उन पर हमला करेगी.
मिसाइल की चेतावनी
NSA में एक खास विभाग है जिसका नाम है डिफेंस स्पेशल मिसाइल और एस्ट्रोनॉटिक्स सेंटर (Defense Special Missile and Astronautics Center). वर्ष 1964 में इस केंद्र की शुरुआत हुई थी और शीत युद्ध के दौरान ये रूस की मिसाइलों और अंतरिक्ष कार्यक्रम पर नजर रखता था. धीरे-धीरे इस केंद्र ने रूस के बाद चीन और दूसरे देशों द्वारा लॉन्च की गई मिसाइलों की सर्विलांस शुरू कर दी. यह एक प्रकार का शुरुआती चेतावनी प्रणाली (Early Warning System) है जो अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट और दुनिया के कई देशों में अमेरिका या उसके मित्र देशों के राडार के डाटा को इकट्ठा करके मिसाइलों की लॉन्चिंग की खबर देता है. पिछले करीब 55 वर्षों से ये केंद्र दिन के 24 घंटे, 365 दिन लगातार सक्रिय यानी सतर्क रहा है. वर्ष 1991 में पहले खाड़ी युद्ध में भी इस केंद्र ने अमेरिका और गठबंधन देशों की सेनाओं को काफी मदद दी थी.
इसी केंद्र (Center) की वजह से इराक के दो एयरबेस पर मौजूद हजारों अमेरिकी सैनिकों को मिसाइल हमले की चेतावनी मिल गई और वो जमीन के नीचे बने बंकरों में छिप गए थे. ईरान से लॉन्च की गई मिसाइलें जब सैकड़ों किलोमीटर दूर थी तभी अमेरिकी सैनिकों को ये चेतावनी मिल गई थी और उनके पास बचने के लिए काफी वक्त था. कुल मिलाकर इराक में अमेरिका और उसके मित्र देशों के 5 हज़ार से अधिक सैनिक मौजूद हैं और मिसाइलों का पता लगाने वाला अमेरिकी सिस्टम उनकी सुरक्षा के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. इस तरह अमेरिका ने अपने सैनिकों की सुरक्षा सफलतापूर्वक तय कर दी लेकिन ईरान के मिसाइल हमले के बाद अपने सम्मान की रक्षा करने के लिए अब अमेरिका जवाबी कार्रवाई कर सकता है.
पश्चिम एशिया में अमेरिका की ताकत
ईरान से अमेरिका की दूरी करीब 11 हजार किलोमीटर है. लेकिन पश्चिम एशिया में अमेरिका के कई सैन्य अड्डे हैं. यही कारण है कि अमेरिका की सेना अपने घर में जितनी ताकतवर है, उतनी ही ताकतवर वो विदेशी धरती पर भी है. अमेरिका ने ईरान पर दबाव बढ़ाने के लिए छह B-52 बमवर्षक विमान हिंद महासागर में मौजूद अपने सैनिक अड्डे Diego Garcia (डिएगो गार्सिया) में भेज दिए हैं. ईरान के करीब अरब सागर में अमेरिका का एयरक्राफ्ट करियर यूएसएस कार्ल विल्सन (USS Carl Vinson) मौजूद है. इस जहाज पर लगभग 90 फाइटर जेट और हेलीकॉप्टर तैनात हैं जो ईरान पर हमला कर सकते हैं.
ईरान से करीब 800 किलोमीटर दूर कतर में अमेरिका के आधुनिक फाइटर जेट F-22 Raptor तैनात हैं. Radar की पकड़ में आए बिना उड़ने की खासियत वाले इस फाइटर जेट का मुकाबला करना ईरान के लिए मुश्किल होगा. इसके साथ ही कतर में अमेरिका के 10 हजार सैनिक भी मौजूद हैं.
ईरान से 600 किलोमीटर दूर कुवैत में अमेरिकी सेना के 13 हजार सैनिक हैं और ये पश्चिम एशिया में युद्ध लड़ने की क्षमता से लैस हैं. इसके अलावा उत्तरी इराक में अमेरिका की स्पेशल फोर्स है. जो ईरान की पकड़ में आए बिना उसकी सीमा में घुसकर मिलिट्री ऑपरेशन कर सकती हैं. और तो और अमेरिका के 1700 सैनिक टर्की में, तीन-तीन हजार सैनिक सऊदी अरब और जॉर्डन में और करीब एक हजार सैनिक सीरिया में भी हैं. कुल मिलाकर ईरान अब अमेरिका के सैन्य चक्रव्यूह में फंस गया है. अमेरिका जब चाहे इन सैन्य अड्डों से ईरान पर हमला कर सकता है.