दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे की सभी यात्री गाडियों में बायो-टॉयलेट की सुविधा प्रदान की गयी

बिलासपुर. स्वच्छता अभियान के मददेनजर रेलवे की हमेशा से प्रयास रहा है कि स्टेशन परिसर, प्लेटफार्म, गाडी, यहॉ तक की रेलवे टै्रक भी साफ सुथरा रहे। खुले शौलयों के उपयोग से तथा टै्रक अक्सर गन्दा हो जाया करता था, यहॉ तक कि हमारे पांइंटस गंदे होकर परिचालन को भी प्रभावित करते है।  ऐसी परेशानी से निजात पाने के लिए भारतीय रेलवे एवं रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ने एक साथ मिलकर बॉयो-टायलेट का विकास किया है। यह बॉयो-टायलेट पर्यावरण के अनुकुल है इसमें मानव अवशिष्ट 6 से 8 घंटे में हानि रहित पानी और गैस में तब्दील होकर वातावरण में मिल जाता है। इसमें सीधे टैंक से डिस्चार्ज नही होता है। जिससे स्टेशन एवं पटरी के आस पास स्वच्छता बनाये रखने में आसानी होती है। दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे में 30 सितम्बर, 2019 तक सभी कोचो में बायो-टैंक के सुविधा प्रदान की गयी है। इस रेलवे में सभी पुराने 1206 यात्री कोचों में 4299 बायो-टैंक सफलता पूर्वक लगाए जा चुके है। बॉयो-टैंक स्टेनलेस स्टील का बना होता है। इसकी लंबाई 1150 मि.मी. और चौड़ाई 720 मि.मी. उचाई 540 मि.मी. आयतन 400 लीटर बैक्टीरिया 200 लीटर। इस प्रकार इस टैंक का कुल भार खाली में 168 किलो एवं भरी अवस्था में 425 किलो ग्राम का होता है। एक टैंक की लागत लगभग 75 हजार रूपये. आती है।
बायो-टैंक के सुचारू रूप से कार्य करते रहने के लिए यात्रियों से अनुरोध है कि इस प्रकार के टायलेट में चाय के कप, पानी के बोतल, गुटका पाउच, पॉलीथीन, डायपर इत्यादि इनमें ना डाले। इनके डाले जाने से बॉयों-टायलेट जाम होकर यह सुचारू रूप  से कार्य नहीं कर पाता है जिससे ओवर फ्लो होकर गंदगी बाहर आ जाती है।

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