पाकिस्तान में अभिव्यक्ति की आजादी की खुली पोल, पत्रकार के अपहरण ने खड़े किए कई सवाल


इस्लामाबाद. पाकिस्तान (Pakistan) की राजधानी इस्लामाबाद से अगवा किए गए वरिष्ठ पत्रकार मतीउल्लाह जान (Matiullah Jan) 12 घंटे बाद सकुशल वापस लौट आए हैं, लेकिन इस वारदात ने इमरान खान (Imran Khan) सरकार पर कई सवाल खड़े किये हैं.

पाकिस्तान के संविधान का अनुच्छेद 19 लोगों को बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी देता है. कुछ प्रतिबंधों के साथ प्रेस की स्वतंत्रता की भी गारंटी देता है, लेकिन इनमें से किसी पर भी अमल नहीं हो रहा है. इमरान खान के राज में न तो आम आदमी अपनी जुबान खोल सकता है और न ही पत्रकार. जो भी ऐसा करता है उसके खिलाफ पूरी सरकारी मशीनरी एकजुट हो जाती है.

मतीउल्लाह जान इसके ताजा उदाहरण हैं, जिन्हें 21 जुलाई को दिनदहाड़े अगवा कर लिया गया था. अपहरण की पूरी वारदात एक सीसीटीवी में कैद हो गई, जिसके चलते लोगों को इस बारे में पता चला और सरकार पर मतीउल्लाह की रिहाई का दबाव बनाया जा सका. लोगों ने सोशल मीडिया पर इस्लामाबाद की कमजोर कानून व्यवस्था पर सवाल किये और पाकिस्तानी प्रतिष्ठान की तुलना आतंकवादी समूह तक से कर डाली.

दरअसल, पत्रकार जान को पाकिस्तान की शीर्ष अदालत में पेश होना था. माना जा रहा था कि वह न्यायाधीश फैज़ ईसा (Faiz Isa) के समर्थन में कुछ कह सकते हैं, जो अपनी संपत्ति का ब्यौरा देने में विफल रहने के आरोपों का सामना कर रहे हैं. चूंकि, जान के न्यायाधीश के पक्ष बोलने की संभावना थी, इसलिए लोगों को यह समझते देर नहीं लगी कि इस पूरे अपहरण कांड के पीछे पाकिस्तानी सेना का हाथ है. इसके बाद पाकिस्तानी सरकार पर पत्रकार की रिहाई के लिए जबरदस्त दबाव बनाया गया.

दबाव इतना बढ़ गया कि 12 घंटों के बाद अपहरणकर्ताओं को पत्रकार मतीउल्लाह जान को आजाद करना पड़ा. जान ने ट्वीट करके अपनी रिहाई के बारे में जानकारी दी है. पिछले एक साल से पाकिस्तान में पत्रकारों और प्रेस पर हमले बढ़ गए हैं. पाकिस्तानी सरकार और सेना मीडिया को उसका काम करने से रोक रही है. इसी के तहत के एक प्रमुख अखबार को परेशान किया गया. विपक्षी नेताओं को मंच मुहैया कराने के लिए कई न्यूज़ चैनलों को ऑफ एयर किया गया. कुछ समय में ही यहां चार पत्रकारों और ब्लॉगरों को मौत के घाट उतारा जा चुका है और उनके हत्यारे अब तक आजाद हैं.

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