फांसी हुई तो निर्भया के क़ातिलों से नहीं पूछी जाएगी उनकी आखिरी ख्‍वाहिश…

नई दिल्‍ली. किसी कैदी को फांसी देने से पहले उसकी आखिरी इच्छा पूछी जाती है औऱ वो पूरी भी की जाती है. ऐसा ज्यादातर भारतीय मानते हैं. इसके पीछे कारण भी है. कईं कहानियों में ऐसा ही लिखा भी गया है और बॉलीवुड की ज्यादातर फिल्मों में भी अब तक यही दिखाया गया है. लेकिन अगर हम कहें कि 2012 में निर्भया की बलात्कार के बाद हत्या करने के दोषियों से उनकी अंतिम इच्छा नहीं पूछी जाएगी तो आपको शायद हैरानी होगी.. लेकिन ये सच है कि अगर उनकी फांसी का वक्त आया तो उनसे कोई अंतिम इच्छा नहीं पूछी जाएगी.

अब आपको ये जानकर और भी हैरानी होगी कि सिर्फ निर्भया के कातिल ही नहीं, आज़ादी के बाद से अब तक जितने भी लोगों को फांसी दी गई है उनसे उनकी आखिरी इच्छा नहीं पूछी गई. चाहे वो बलात्कारी धनंजय महापात्र हो या फिर इंदिरा गांधी के हत्यारे सतवंत सिंह और केहर सिंह हों. जब इन दोषियों से भी फांसी के वक्त इनकी इच्छा नहीं पूछी गई तो फिर मुंबई हमले के आतंकी अज़मल कसाब और संसद पर हमले के आतंकी अफज़ल गुरु से तो उनकी आखिरी इच्छा पूछने का सवाल ही पैदा नहीं होता.

इसमें हैरान होने की बात ये है कि कानून में फांसी देते वक्त अंतिम इच्छा पूछने का कोई प्रावधान ही नहीं है. जेल मैनुअल में ऐसा कुछ है ही नहीं. यानी ये सिर्फ कहानियों और फिल्मी दुनिया की ही कल्पना है, हकीकत से इसका कोई वास्ता नहीं है. तिहाड़ जेल के पूर्व डीजी अजय कश्यप के मुताबिक आखिरी इच्छा पूछने की परंपरा सिर्फ फिल्मों में ही दिखाई जाती है, जबकि हकीकत में ऐसा नहीं है. वे कहते हैं कि फांसी देना एक न्यायिक आदेश होता है जिसे हर हाल में तय वक्त पर ही पूरा करना होता है. अगर फांसी के वक्त कैदी ने अपनी अंतिम इच्छा के तौर पर फांसी ना देने की इच्छा जता दी तो फिर क्या किया जाएगा. उनके मुताबिक फांसी देने से पहले एसडीएम के सामने कैदी की वसीयत जरूर करवाई जाती है कि उसके मरने के बाद उसकी प्रॉपर्टी और तमाम चीज़ों का उत्तराधिकारी कौन होगा और उसका अंतिम संस्कार कैसे और कौन करेगा.

ऐसे दी जाती है फांसी
फांसी देने के वक्त कैदी को 22 फुट के एक तख्ते पर ले जाया जाता है. इस दौरान उसे नीचे से लेकर ऊपर तक काले कपड़े पहननाए जाते हैं. फांसी देने से पहले उसके हाथ और पांव बांध दिए जाते हैं और चेहरे पर भी काला कपड़ा डाल दिया जाता है. इसके बाद रस्सी का फंदा गले में डाला जाता है. इसके बाद तय वक्त पर जल्लाद फांसी के तख्ते का लीवर खींच देता है जिसके बाद कैदी के पांव के नीचे का तख्त नीचे की तरफ खुल जाता है और कैदी का शरीर लटक जाता है. फांसी लगने के बाद आधे घंटे तक उसके शरीर को रस्सी पर लटका रहने दिया जाता है और उसके बाद डॉक्टर ये चेक करता है कि कैदी की मौत हो गई है या नहीं. उसके बाद शव का पोस्टमार्टम किया जाता है और फिर अगर जेल सुपरिटेंडेट को ये लगे कि मरने वाले के शव और उसकी चीज़ों का गलत इस्तेमाल नहीं किया जाएगा तो वो शव उसके परिजनों को सौंप देते हैं.

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