बिहार के बाद दिल्ली का छात्र-शिक्षक अनुपात सबसे ज्यादा खराब

नई दिल्ली. दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद दावे किए जा रहे थे कि दिल्ली को शिक्षा के मामले में फिनलैंड बनायेंगे, लेकिन दावे-वादे और इरादे सब धरे के धरे रह गए. आपको बता दें कि अगर देश की राजधानी में शिक्षा का हाल जान लिया तो हैरान रह जाएंगे. क्योंकि जहां बैठकर ‘माननीय’ शिक्षा की नीति बनाते हैं वही राजधानी दिल्ली छात्र-शिक्षक अनुपात (Student-Teacher Ratio) के मामले में बिहार के बाद सबसे बुरे हाल में है. मानव संसाधन मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि बिहार में छात्र-शिक्षक अनुपात सबसे ख़राब है तो उसके बाद दिल्ली का नंबर है.
बिहार में स्टूडेंट-टीचर रेशू 38:1 है तो दिल्ली में ये आकांडा 35:1 है. राइट टू एजुकेशन एक्ट 2009 के मुताबिक ये तय किया गया कि प्राइमरी में छात्र-शिक्षक अनुपात 30:1 होगा और उपर प्राइमरी में 35:1 होगा. मानव संसाधन मंत्रालय में सेक्रेट्री के पद पर बैठीं मैडम (रीना रे) कहती हैं कि तो क्या, अगर दिल्ली में छात्र-शिक्षक अनुपात नियम के मुताबिक नहीं है.लोग खामखां ही परेशान हैं, ये अनुपात इतना भी खराब नहीं है.
खैर मैडम को ये रेशू खराब लगेगा भी क्यों…कभी एसी दफ्तर से बाहर जाकर देखा होता तो पता भी चलता कि एजुकेशन सिस्टम कैसे गर्त में जा रहा है. क्लास खचाखच भरी है…किसी क्लास में 50 तो, किसी क्लास में 60 तो कहीं 70 बच्चे एक क्लास में बैठकर ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं…ज़मीनी हक़ीकत आंकड़ों से कहीं ज्यादा बदतर है…
प्राइमरी क्लासों में जब बच्चों को टीचर से ज्यादा वक़्त की दरकार होती उस क्लास में अगर टीचर को 70-70 बच्चों को पढ़ाना पढ़ें तो क्या समझाएगा और क्या सिखायेगा बच्चों को? इसका जवाब आप खुद ही ढूंढ लीजिये.
2015-16 के आंकाडें बताते हैं कि दिल्ली के सीनियर सेकेंड्री तक के स्कूलों में करीब 44.31 लाख बच्चे पढ़ते हैं…और 2018 की रिपोर्ट बताती है कि सिर्फ़ दिल्ली सरकार के ही 1100 स्कूलों में 25000 टीचर्स की कमी है और 38926 टीचर अभी इन स्कूलों में पढ़ा भी रहे हैं उसमें से 17 हज़ार गेस्ट टीचर हैं…दिल्ली में शिक्षा की हालत बेहद खराब है…एजुकेशन सिस्टम धराशाही हो रहा है.
भारत शिक्षा के क्षेत्र में जीडीपी का 3 फीसदी खर्च करता है जबकि शिक्षा के क्षेत्र में गुणवक्ता लाने के लिए जीडीपी का 6 फीसदी हिस्सा खर्च करनी की ज़रूरत है…और हां, शिक्षा का स्तर सिर्फ़ टीचरों की ट्रेनिंग विदेश में करवाने से नहीं सुधरेगा…इसके लिए स्टूडेंट्स – टीचर अनुपात सुधारने की भी ज़रूरत है.