Category: संपादकीय

गंगा बहती हो क्यूँ? : नदियों का वैतरणी बनना और लाशों के अधिकार का प्रश्न

इन दिनों गंगा, यमुना, नर्मदा, केन, बेतवा सभी नदियों के वैतरणी नदी बन जाने की खबरें आ रही हैं। यहां ओड़िसा में कटक और बालासोर की सीमा पर बहने वाली वैतरणी की नहीं, हिन्दू धर्मशास्त्रों की वैतरणी नदी की बात हो रही है। यह यम की नदी है। यह नर्कलोक के रास्ते में पड़ने वाली

छत्तीसगढ़ : बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था से कोरोना को मिला ऑक्सीजन

वर्ल्डोमीटर के अनुसार, मई के पहले सप्ताह में इस दुनिया में कोरोना पीड़ित हर दूसरा व्यक्ति भारतीय था. जहां पूरी दुनिया में इस अवधि में कोरोना के मामलों में 5% की और इससे होने वाली मौतों में 4% की कमी आई है, वहीँ भारत में कोरोना के 5% मामले बढ़े हैं और इससे होने वाली

सिस्टम की बेशर्मी

हम समझते थे कि एक न एक दिन हमारे सिस्टम को शर्म आएगी पर नहीं आई बेशर्मी और ही बढ़ गई।हमें लगता था यह जनता का,जनता के लिए,जनता के द्वारा सिस्टम है किंतु यह तो    ” जानता ” का सिस्टम है।जो सिस्टम को जानता है वह राज्य करता है,समस्त अधिकारों का उपभोग करता है।जनता

पूछता है भारत, काली टोपी नेकरधारी बटुक कहाँ हैं!!

चुनाव के बीच भी जब नरेंद्र मोदी दलबदल सहित बंगाल में कोरोना की घर-घर डिलीवरी करने में लगे थे, तब चुनाव के बावजूद वहां की जनवादी नौजवान सभा, एसएफआई और जनवादी महिला समिति के रेड वालंटियर्स संक्रमण से पीड़ित लोगों को अस्पताल पहुंचाने, उनके लिए बैड और ऑक्सीजन के बंदोबस्त के लिए जूझ रहे थे।

सरकती जाए है रुख से फासिस्ट नकाब आहिस्ता-आहिस्ता

देश में कोरोना की दूसरी लहर भयावह होती जा रही है। जांच कम होने के बावजूद पिछले तीन दिन से हर रोज तीन लाख से ज्यादा नए मामले सामने आ रहे हैं। देश भर में मरीजों को बेड नहीं मिल रहा है। ऑक्सीजन गायब है। दवाइयां नहीं हैं। लाशों को जलाने की जगह, यहां तक

इलाज की दुकान : अस्पताल

भगवान दुश्मन को भी बीमार न करे।बीमार होने पर इलाज के लिए जहां जाना पड़ता है वह जगह डॉक्टर की दुकान होती है फ्ल्स मेडिकल स्टोर।मेडिकल स्टोर और डॉक्टर की डिस्पेंसरी एक दूसरे की पर्यायवाची होती हैं।एक के बिना दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती। बीमार व्यक्ति की हालत वही व्यक्ति भलीभांति समझ सकता

मोदी की दीदादिलेरी : निर्बुद्धि और संवेदनाशून्य समाज बनाने का प्रोजेक्ट

उस दिन शाम के प्रज्ञा शून्य भाषण और इन दिनों सारे कानूनों, परम्पराओं, संवेदनाओं और मानवता को ठेंगा दिखाकर की जा रही आपराधिक बेहूदगियों को देखकर दो घटनाएं याद आईं। पहली सितम्बर 2008 की है। दिल्ली में हुए बम धमाकों के बाद तब के गृह मंत्री शिवराज पाटिल जब शनिवार रात में प्रेस से बातचीत

सार्वभौमिक टीकाकरण की विदाई!

प्रधानमंत्री मोदी के हालिया संदेश से अब यह स्पष्ट हो गया है कि आजादी के बाद से अब तक किसी भी महामारी से लड़ने के लिए मुफ्त सार्वभौमिक टीकाकरण की सुपरीक्षित नीति को अब अलविदा कह दिया गया है। अब टीकाकरण के दायरे में वही लोग आएंगे, जिनकी अंटी में पैसे होंगे। कोरोना के खिलाफ

लोकतंत्र वेंटीलेटर पर : भाजपा के शिवराज में मध्यप्रदेश बना मृत्युप्रदेश

                                                                                       (आलेख : बादल सरोज) पिछले चार-पांच दिन से सोशल मीडिया पर वायरल

लॉक डाउन : फुल गोडाउन

लॉक डाउन के मायने हर किसी के लिए अलग होते हैं। हमारे लिए लॉक डाउन का मतलब घर पर रहना,बाहर ताक-झांक न करना है। व्यापारियों के लिए लॉक डाउन का मतलब गोडाउन फुल यानी कमाई फुल है।ऐसा भी कह सकते हैं कि उधर हवा फुल, इधर हवा टाइट। कोरोना की कृपा से हमें लॉक डाउन

डॉ. अम्बेडकर की 130 वीं सालगिरह पर विशेष आलेख : बाबा साहब, भारतीय संविधान और मौजूदा खतरे

संविधान सभा के लिए दो बार चुने गए थे बाबा साहब आजादी के लिए हुए समझौते और तिथि तय हो जाने के बीच ही संविधान सभा के लिए चुनाव हुए थे। जुलाई 1946 में करीब 10 लाख पर एक के हिसाब से एक सदस्य के साथ  292 सदस्य चुने गए। इनके अलावा 93 प्रतिनिधि रियासतों

जीवन का रिसेट बटन नहीं होता और न तो टाइम मशीन जैसी कोई मशीन होती है इसलिए जीवन के सुरक्षा को प्रथम प्राथमिकता में रखें. : एच पी जोशी

साथियों जैसा कि आपको ज्ञात है इस बार के Covid-19 कोरोना वायरस पिछले बार के कोरोना वायरस से अधिक घातक है जो पिछले बार के वायरस से अधिक तीव्र गति से प्रसार कर रहा है। इसका मतलब ये कि हमें पिछली बार से अधिक सतर्क रहने की जरूरत है, हम सबने पिछले बार वायरस संक्रमण

खाने-पीने वाले लोग

ब्रह्मा जी ने तलब किया और कहा-तुमको धरती पर जन्म लेना है।तब हमने पूछा-धरती पर कहां जन्म लेना है?उन्होंने कहा- आर्यावर्त,भारत भूमि में।हम समझ गए कि हमें खाने-पीने के लिए भेजा जा रहा है। आश्रमों में रहने वाले आर्य ज्यादातर उपवास करते हैं।उपवास साधना उनकी एक विशिष्ट साधना है।इसमें साधक को अन्न का त्याग तथा

मंकी सिंह की कहानी

बंदर मंकी सिंह की आपबीती कहीं आपकी न हो जाए, इसलिए जल का संरक्षण करें… वन्य जीवों के लिए पर्याप्त जल और वृक्षों की उपलब्धता किस तरह सुनिश्चित किया जाए इसे जानने के लिए मातृका दीदी की सुझाव जरूर पढ़िए… एक बार की बात है दो बहनें मातृका और दुर्गम्या Morning Walk पर जा रही

दूसरे युद्ध से पहले कवच पहन लेना जरूरी

इस समय हम सब कोविड-19 की दूसरी लहर का सामना कर रहे हैं। सालभर पहले जब पहली लहर आई थी तो हमने बहुत सफलतापूर्वक उसका सामना किया था, और अंततः संक्रमण को नियंत्रित भी कर लिया था। तब पूरे विश्व के साथ-साथ भारत के सामने भी अभूतपूर्व परिस्थितियां उठ खड़ी हुई थीं। देश ने पहली

अरे मूर्ख टट्टुओं, हथियारबंद नक्सलियों क्रूरता, हत्या और मृत्यु का रास्ता छोड़कर, नक्सली लीडरों के चमचागिरी को त्यागकर अच्छे जीवन का विकल्प चुनो : एच.पी. जोशी

अरे मूर्ख टट्टुओं, हथियारबंद नक्सलियों क्रूरता, हत्या और मृत्यु का रास्ता छोड़कर, नक्सली लीडरों के चमचागिरी को त्यागकर अच्छे जीवन का विकल्प चुनो… आत्मसमर्पण करके आम नागरिक बनो, अधिकारी, जनप्रतिनिधि, मंत्री और जज बनो : एच.पी. जोशी “लोकतंत्र में हथियार उठाना कायरता की मिशाल है” नक्सलियों के शीर्ष लीडर नाम बदलकर अरबपति का जीवन जीते

मलाई चाटतीं बिल्लियां

राजा साहब की सरकार इन दिनों भारी परेशान चल रही है।जब सरकार साहेब ही परेशान हैं तो मंत्रिगण कैसे शांत रह सकते हैं?परेशानी की वज़ह यह है कि विभिन्न योजनओं के लिए अरबों,खरबों रुपये का आबंटन दिया गया पर विकास कुछ नहीं हुआ।जनता वहीं की वहीं खड़ी जिंदाबाद,मुर्दाबाद कर रही है। विकास किस चिड़िया का

नंदीग्राम : बाप-बेटे, मां और कब्रों से निकलते अस्थिपंजर

नन्दीग्राम और सिंगूर को लेकर खड़े किये गए झूठ के तूमार के चलते  2011 में चुनाव हारने के बाद बुद्धदेब भट्टाचार्य ने कहा था कि *दस साल में सारा सच सामने आ जाएगा* …. और 28 मार्च को नन्दीग्राम की एक चुनावी सभा में ममता बनर्जी ने खुद अपने श्रीमुख से सच उगल  ही दिया।

उधर छाती पर सवार शेर, इधर जंगलराज में छुट्टा घूमता टाइगर

उधर जम्बूद्वीपे भारतखण्डे की जनता “शेर पालने की कीमत” चुकाने के मजे लेते हए कराह रही है। इधर टाइगर अपने जिन्दा होने का शोर मचाते हुए मध्यप्रदेश के जंगल राज में शिकार करता छुट्टा घूम रहा है। शेर पालने वाला जुमला बढ़ती महँगाई, बेलगाम बेरोजगारी और सरकारी सम्पत्तियों की धुँआधार बिक्री, सौ दिन से ज्यादा

जहँ जहँ पाँव पड़े कारपोरेट के, तहँ तहँ खेती बँटाढार

(आलेख : बादल सरोज) सार रूप में कहानी यह है कि आधी रात में अलाने की भैंस बीमार पड़ी। बीमारी समझ ही नहीं आ रही थी। उन्हें किसी ने बताया कि ठीक यही बीमारी गाँव के फलाने की भैंस को भी हुयी थी। वे दौड़े-दौड़े उनके पास गए और वो दवा पूछकर आये, जो उन्होंने
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