(आलेख : अशोक तिवारी) “चम्बल एक्सप्रेस वे” — चंबल के बीहड़ में फोरलेन राष्ट्रीय राजमार्ग बनाने का प्रोजेक्ट — वर्ष 2018 से लंबित है| यह केंद्र सरकार द्वारा निर्मित होने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग है। पहले यह एक्सप्रेस वे भिंड से शुरू होकर श्योपुर कलां (मुरैना जिले का यह हिस्सा अब नया जिला है) तक लगभग
एचपी जोशी सावधान और सुरक्षित रहिए क्योंकि कोरोना वायरस इस तस्वीर में दिख रहे फूल जैसे नग्न आंखों से दिखाई नही देता। दीगर राज्य और विदेशों से आने वाले अथवा कोरोना संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने वाले कोई भी व्यक्ति कोरोना वायरस से संक्रमित हो सकते हैं, संक्रमित व्यक्ति के हथेली देखकर आप नही
(आलेख : संध्या शैली) 18 मई सुबह तक कोविड-19 या कोरोना से दुनिया भर में हुयी मोैतों के आंकडों के हिसाब से 3 लाख 15 हजार से ज्यादा लोग इस बीमारी के शिकार हो चुके थे। 47 लाख से ज्यादा संक्रमित थे और 17 लाख ठीक हो चुके थे। हर दिन 5000 से ज्यादा लोग
आलेख- श्री हुलेश्वर जोशी कर्म का सिद्धांत क्या है? कर्मफल क्या है? इसे जानने के पहले हमें कर्म को जानना होगा, कि कर्म क्या है? कर्म किसे कहेंगे? कर्म अच्छे हैं या बुरे? कर्म का फल स्वयम के कर्म के अनुसार मिलता है कि हिस्सेदारी सबकी होती है? इन सब प्रश्नों का उत्तर जानने के
मैं देख रहा हूं की आज युवा बहुत बुझा बुझा सा नजर आ रहा है। ये हताशा ठीक नहीं आक्रमकता जरुरी है। उस आक्रमकता की दिशा राजनीतिक नहीं बल्कि स्वयं से जुड़े मुद्दों के लिए होना चाहिए। आक्रमकता का हमें अपने हितों व समस्याओं के ध्यानाकर्षण के लिये उपयोग करना चाहिए। यह आक्रामकता हम में
विगत 7 वर्षो से भारतीय राजनीति मे जो गिरावट आयी है उसके मोदी जी और अमित शाह जी अहम करदार है। कार्पोरेट्स की शह पर तत्कालीन यूपीए सरकार को बदनाम करने की जो मुहिम इन्होने चलाई, उसमे सफल भी रहे, लेकिन भारतीय राजनीति व लोकतंत्र का जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई शायद जल्दी संभव नही होगी। सरकार मे बैठे अवसरवादियों
(आलेख : बादल सरोज) एक कहावत है कि गिद्ध को सपने में भी लाशों के ढेर नजर आते हैं। भेड़ियों की बरात गाँव बसाकर नहीं लौटती। ठीक इसी तर्ज पर इन दिनों, कोरोना आपदा के इतने बड़े संकट के समय भी, बर्बरता के अग्रदूत और अँधेरे के पुजारियों का आचरण है। अहमदाबाद से गुजरात भर और
तुम नहीं कमजोर, मजबूर मत समझना। आवाज कर बुलंद, युवाओं का काम धधकना सशक्त युवा वह सैलाब है, जिसे रोका नहीं जा सकता है। अगर आप शसक्त नहीं है, तो इसका सीधा मतलब है, आप मजबूर हैं। पराधीन हैं। दूसरे की दया पर निर्भर हैं। क्या युवाओं का जीवन सिर्फ आत्मगौरव महसूस करने से चल जायेगा? क्या जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र, राष्ट्र, सीमाएं, परंपरा, संस्कृति, देशी, विदेशी ईत्यादि जैसे मुद्दों
देशभक्ति, यह शब्द आज कल बहुत प्रचलन मे है। जिसे देखो वही देशभक्ति का गाना गा रहा है। अभी कुछ दिन पहले पूरे देश मे थाली बजा कर, दीया जलाकर देशभक्ति दिखाने की होड़ मची हुई थी। इससे खुशी भी हुई कि समस्त देशवासी देशभक्त है। लेकिन अब बारीकी से नजर डालता हूं तो देखता हूं कि
जीवन तुझे है बढ़ते रहना, जलकर होना राख नहीं ऐ युवा तू अवसर वाद की, भट्टी का अंगार नहीं युवाओं को अब स्पष्ट संदेश देना होगा कि युवा अवसरवाद की भट्टी में तपता लोहा नहीं है जिसे जैसे चाहा ढ़ाल लिया। युवा धर्म, संप्रदाय, जाति, भाषा क्षेत्र को लेकर नफरत फैलाने का औजार नहीं है जिसे जब चाहा चला लिया। युवा झूठ को
लाचार सिसकता मजबूत भारत के निर्माण का स्तंभ गरीब मजदूर भूखे, प्यासे, रोते बिलखते सैकड़ो किलोमीटर की यात्राएं कैसे कर रहा है, यह तो भगवान ही जानता है। कोई पैदल जा रहा है। कोई सायकल से। कोई मालगाडी मे तो कोई गुड्स वाहन मे। आज सुबह बांदा (यूपी) के तीन भाई मेरे पास आए जो
देश की अर्थ व्यवस्था टूट रही है। बेरोजगारी बढ़ रही है। अफसरशाही सर चढ़ कर बोल रही। युवाओं जागोगे की सोये रहोगे, अब यह निर्णय लेने का वक्त आ गया है। राजसत्ता आपको चुनौती दे रही है। भय, आतंक, नफरत के वातावरण में फंसा कर आपको लूट रही है। क्या अब भी प्रश्न नहीं करोगे।
एक ओर पूरा विश्व कोरोना की महामारी से जूझ रहा है। दूसरी ओर भारत मे झूठ, नफरत, घृणा का बाजार तप रहा है। विगत कुछ वर्षो मे धर्मो व जातियों के बीच इस कदर कटुता फैला दी गई है कि मनुष्य एक दूसरे का विरोधी नही वरन् दुश्मन बन गया है । नफरत की पराकाष्ठा
(धीरेंद्र कुमार द्विवेदी) आए दिन देश- प्रदेश में सुनने व देखने को मिलता है कि पूरा देश कोरोना वायरस से लड़ने में अपना सर्वस्व न्योछावर कर रहे हैं वहीं कोरोना वारियर्स को भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है पूरे देश में लॉक डाउन को पूर्णता लागू कराने में पुलिस जवानों को भी
(आलेख : बादल सरोज) कोरोना की आपदा ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि खतरे में सिर्फ भात-रोटी, छत-रोजगार और जिंदगी भर नहीं है। खतरे में पूरी दुनिया है – वह पृथ्वी है, जिस पर मनुष्यता बसी है। जंगल नेस्तनाबूद कर दिए, नदियाँ सुखा दीं, धरती खोदकर रख दी, पशु-पक्षियों को उनके घरों
(आलेख : बादल सरोज) इतिहास के साथ एक सुविधा है, इसे आराम से देखा जा सकता है। दुविधा यह है कि दीवार पर लटकी तस्वीरों को बदलकर इसे बदला नहीं जा सकता। इतिहास हमेशा मैक्रो रूप में होता है, एक सूर्य के दीप्तिमान पिंड पुंज की तरह। इसे नैनो या माइक्रो करके नहीं देखा जा
(आलेख : बादल सरोज) मौजूदा समय विडम्बना का समय है। बिना किसी अतिशयोक्ति के कहा जाए तो; देश और समाज एक ऐसे वर्तमान से गुजर रहा है जिसमे प्राचीन और ताजे इतिहास में, अंग्रेजो की गुलामी से आजादी के लिए लड़ते लड़ते जो भी सकारात्मक उपलब्धि हासिल की गयी थी, वह दांव पर है। समाज
(आलेख : संजय पराते) कल लॉक डाऊन के पहले चरण का आखिरी दिन है और इसके बाद दूसरा चरण शुरू हो जाएगा। 21 दिनों की तालाबंदी में संघी गिरोह ने खूब थाली-घंटे बजवाये, खूब मोमबत्ती-टॉर्च जलवाए, लेकिन कोरोना का हमला थमने का बजाए बढ़ता ही गया है। कल दस बजे जब *जिल्ले इलाही* संबोधित कर
(आलेख : बादल सरोज) 1757 भारतीय इतिहास का विडंबना वर्ष है। इसी साल प्लासी का लगभग अनहुआ युद्ध जीत कर ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में अपने राज की शुरुआत की थी। रानी एलिजाबेथ से भारत से व्यापार की 21 साल की अनुमति लेकर ईस्ट इंडिया कंपनी बन तो 1600 में ही गयी थी।
बादल सरोज इंदौर की टाटपट्टी बाखल में कोरोना संभावित बुजुर्ग को जांच के लिए लेने गयी डॉ ज़ाकिया सैयद और नर्सेज, पैरा मेडिकल स्टाफ के साथ जिस तरह की बेहूदगी और बदतमीजी हुयी उसकी सिर्फ निंदा, भर्त्सना और मज़म्मत ही की जा सकती है। उसे लेकर किसी भी लेकिन, किन्तु, परन्तु, अगर, मगर, फिर भी