बीजापुर में 100 घरों को तोड़ना प्रशासनिक आतंकवाद – दीपक बैज
रायपुर. बीजापुर जिला मुख्यालय में भाजपा सरकार के द्वारा अतिक्रमण के नाम पर 100 से ज्यादा घरों पर बुलडोजर चलाये जाने पर कड़ी नाराजगी जताते हुए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने छत्तीसगढ़ शासन की बीजापुर जिला मुख्यालय में हुई बुलडोजर कार्रवाई को संवेदनहीनता और प्रशासनिक आतंकवाद है। तोड़े गये घर उन लोगों के घर हैं जो अंदरूनी गांवों से नक्सलियों से जान बचाकर विस्थापित हुए हैं जिनमें लगभग 25 मकान डीआरजी जवानों के हैं जिनमें कुछ नक्सलियों से लोहा लेने जंगलों में हैं और उनकी अनुपस्थिति में उनकी पत्नी बच्चों को सड़कों पर तड़पने छोड़ दिया गया है,10 से 15 घर ऐसे हैं जिन्होंने नक्सलवाद को छोड़ मुख्य धारा में खुद को शामिल किया है,दीपक बैज ने बताया कि 45 से 50 मकान में रहने वाले परिवार वे लोग हैं जो नक्सल पीड़ित हैं जिन्होंने अपनों को नक्सल हिंसा में खोया है और खुद की जान बचाकर जिला मुख्यालय में जीवन जीने मजबूर हैं और जो चाह कर भी अंदर अपने गांव नहीं लौट सकते ऐसे परिवारों पर सरकार का बुलडोजर चलना महा पाप से कम नहीं है इसकी जितनी निंदा की जाए कम है तत्काल इनके लिए राज्य सरकार को वैकल्पिक व्यवस्था करनी होगी।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि एक तरफ केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह जिन डीआरजी के जवानों के दम पर 31 मार्च 2026 तक बस्तर से नक्सलवाद के खात्मे का दंभ भर रहे हैं और उनके इस घोषणा को सच साबित करने जो डीआरजी के जवान अपनी जान की बाजी लगाने पीछे नहीं हट रहे हैं उन्हीं डीआरजी के जवानों के घरों पर अतिक्रमण के नाम पर विष्णु देव साय का बुलडोजर चल रहा है और उनके आशियानों को बुलडोजर एक्शन से उजाड़ा जा रहा है,ना पूर्व सूचना दी जा रही है ना वैकल्पिक व्यवस्था की गई है कड़ाके की ठंड में अतिक्रमण के नाम पर ग्रामीणों आदिवासियों और डीआरजी के जवानों के परिवारों को छोटे-छोटे बच्चों को सड़कों पर रोने बिलखने और ठंठ में ठिठुरने सड़क पर छोड़ दिया गया है। दीपक बैज ने अमित शाह से इस कार्यवाही पर पूछा है क्या इसे एहसान फरामोशी नहीं कहा जाना चाहिए,क्या इसे प्रशासनिक आतंकवाद नहीं कहा जाना चाहिए,क्या इसे संवेदनहीनता की सारी हदें पार करना नहीं कहा जाना चाहिए।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि बीजापुर जिला मुख्यालय में हुई बुलडोजर कार्यवाही साबित करती है कि भाजपा सरकार किसी की हितैषी नहीं हैं, ना आदिवासियों की, ना नक्सलवाद के खात्मे के लिए अपने जान को दांव पर लगाने वाले वीरों की, ना विस्थापितों के ये सिर्फ और सिर्फ उद्योगपति मित्रों के ही हितैषी हैं जिनके लिए नियम विरुद्ध ये जंगल काटते हैं, नियम विरुद्ध ये पहाड़ बांटते हैं कोई गरीब और नक्सल प्रभावित अपने परिवार के सर ढकने मकान बना लेता है तो उस पर बुलडोजर चला देते हैं।


