शहर के चौक-चौराहों, कलेक्ट्रेट परिसर, कंपोजिट बिल्डिंग समेत सभी जगहों पर उड़ रही है धज्जियां धारा 144 की

बिलासपुर. बिलासपुर जिले की सीमा में धारा 144 लागू करने के बाद प्रशासन और पुलिस की बात तो दूर कुछ कलेक्टर भी शायद इसे भूल गए हैं। अगर जिले में लागू 144 धारा का ही पालन प्रशासन पूरी शिद्दत से करा लेता। तो भीड़ भाड़ और सोशल डिस्टेंसिंग की उपेक्षा से कोरोना संक्रमण के फैलने की आशंका खत्म हो जाती। लेकिन बिलासपुर जिले में धारा 144 लागू है.. यह शायद सरकारी कागजों में ही उल्लिखित होगा…शहर की सड़कों, चौक चौराहों समेत अधिकांश जगहों व गली मोहल्लों में सरसरी नजर डालने पर इस बात का जरा भी एहसास नहीं होता कि बिलासपुर अभी धारा 144 के साए में है।
बड़ी विडंबना है कि जैसे किसी दीवार पर लिखा रहता है कि… यहां थूकना मना है या फिर यहां पेशाब करना मना है.. उसके बावजूद लोग, बाज आते दिखाई नहीं देते। और वही उसी जगह पर लघु शंका करना और थूका-थाकी जारी रखते हैं। दीवार पर इस तरह की इबारत लिख आने वाले शख्स की तरह ही क्या जिले का प्रशासन इतना कमजोर हो गया है कि वह अपने ही आदेश का पालन नहीं करा पा रहा है। शहर की सभी सड़कों और गली मोहल्लों तथा चौक चौराहों के अलावा बृहस्पति बाजार, व्यापार विहार, शनिचरी पड़ाव व बुधवारी बाजार जैसी जगहों पर रोज उमड़ने वाली भीड़  144 धारा का और उसे लगाने वाले का मखौल उड़ाते दिखाई देती है।

प्रशासन के अधिकारी आज के कोविड-19 के दौर में जानलेवा हो चुकी ऐसी भीड़ को, रोज बिलासपुर में अपनी आंखों से देखते हैं। मगर उसके बावजूद उन्हें कहीं से ऐसा नहीं लगता कि हर कहीं हो रहे धारा 144 के उल्लंघन को रोका जाना चाहिए। अगर ऐसा करने में प्रशासन अपने आप को असमर्थ पा रहा है। तो उसे बेवजह धारा 144 के साथ (बिलासपुर के हर चौक चौराहो, गली-मोहल्लों तथा बाजारों में) हो रही जिल्लत और जलालत से बचाने के लिए, इस धारा को ही बिलासपुर से वापस ले लेना चाहिए। इससे कम से कम धारा 144 की इज्जत तो बनी रहेगी।

केवल आदेश देने से कुछ नहीं होता 
ऐसा लगता है कि बिलासपुर जिले में प्रशासन के कर्णधार अफसर किसी भी मामले में सख्त से सख्त आदेश देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं। लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए। कोई भी आदेश देने, अथवा कानून लागू करने वाले अफसर को यह भी देखना चाहिए कि उसका पालन हो रहा है अथवा नहीं। और अगर उसका पालन नहीं हो रहा है तो पूरी शिद्दत के साथ कमर कस कर अपने आदेश का परिपालन कराने की “जिद” भी अधिकारियों में होनी चाहिए।जिले में बड़े-बड़े पदों पर बैठे उन अधिकारियों का क्या लाभ..जो आदेश कुछ दे रहे हैं और जिले में हो कुछ और रहा है.. और जो अपने आदेश का पालन ही ना करवा सकें।

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