अग्नि, सांप, कुसंग इन्हें कभी छोटा नहीं समझना चाहिए..संत विजय कौशल

 

बिलासपुर। जीवन में कुसंग कभी मत करिए, कुसंगति बहुत ही खतरनाक होती है। जहां छिपकर जाना पड़े, बैठना पड़े, खाना पड़े, वहां कभी नहीं जाना चाहिए। दुश्मन भी खतरनाक होते हैं। अग्नि, सांप, कुसंग इन्हें कभी छोटा नहीं समझना चाहिए। ये सदमार्ग  से भटका देते हैं।

लाल बहादुर शास्त्री स्कूल मैदान में आयोजित श्री राम कथा में भगवान राम के वनगमन के पावन प्रसंग पर प्रकाश डालते हुए संत श्री विजय कौशल जी महाराज ने कहा कि कैकेयी मंथरा की कुसंगति में पड़कर रूठी हुई कोप भवन में बैठी थी। राजा दशरथ जी प्रसन्न मुद्रा में कैकेयी के पास पहुंचते हैं। तब उन्होंने राजा दशरथ की बातों को अनसुनी करते हुए अपनी मांगों के बारे में बताया।

उन्होंने राजा दशरथ से दो मांगें रखीं—एक भरत जी को राजगद्दी और भगवान राम को 14 वर्षों का वनवास। राजा दशरथ ने भरत जी को राजगद्दी देना स्वीकार कर लिया, किंतु राम को वनवास भेजने पर सहमत नहीं हुए। राजा दशरथ बहुत दुखी हो गए। बहुत अनुनय-विनय करने लगे कि राम के वियोग को मैं सहन नहीं कर पाऊंगा। तुम मुझे जिंदा देखना चाहती हो तो राम के वनवास की मांग का त्याग करो। लेकिन मंथरा के कुसंग में पड़कर कैकेयी नागिन बन गई थी। उन्होंने दशरथ जी की बात नहीं मानी। अयोध्या में बाहर लोग राम राज्याभिषेक की खबर सुन आनंदित  थे, चारों ओर **खुशियाँ** मनाई जा रही थीं, लेकिन अंदर कुछ और चल रहा था। राम का जहाँ राज्याभिषेक होना था, वहीं उन्हें 14 वर्षों के वनवास पर जाना पड़ा। कैकेयी की जिद के आगे राजा दशरथ को झुकना पड़ा और वे **मूर्छित** हो गये। सुमंत जी ने भगवान राम को **वस्तुस्थिति** से अवगत कराया। वे सहर्ष वनगमन के लिये तैयार हो गये। सीता माता से जब उन्होंने बात बताई तो उन्होंने भी साथ चलने को कहा। राम जी ने उन्हें बहुत समझाया कि वन में तुम्हें हर प्रकार की तकलीफें और दुख होंगे। सीता जी ने कहा, मैं सब कुछ सहने को तैयार हूँ। मैं आपकी छाया हूँ, आपके साथ ही चलूँगी। लक्ष्मण जी ने भी कहा, मैं भूमि की पुत्री हूँ। मैं अपनी माँ की गोद में खेलने जा रही हूँ। लक्ष्मण जी को यह पता चला तो वे भी साथ जाने को तैयार हो गये। लक्ष्मण जी का जब जन्म हुआ तो वे सोते नहीं थे, दूध नहीं पीते थे। वशिष्ठ जी से इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि लक्ष्मण शेषनाग के अवतार हैं। इन्हें राम जी के साथ सुलाया करें और भगवान के पैरों का अंगूठा चूसने के लिये दिया करें।

लक्ष्मण जी सुमित्रा जी के पास प्रणाम करने गये। तब उन्होंने कहा कि मैं तुम्हारी माँ नहीं हूँ। तो उन्होंने पूछा कि फिर मेरी माँ कौन है। सुमित्रा जी ने कहा कि तुम्हारी माँ वैदेही है। तुम जाओ और भगवान के साथ रहो ।  संत श्री ने लक्ष्मण की धर्मपत्नी उर्मिला जी के त्याग का वर्णन करते हुए कहा कि उर्मिला जी को जब खबर मिली तो वे प्रसन्न हो गईं। लक्ष्मण जी वनगमन से पूर्व उर्मिला जी से मिलने गये। उन्होंने लक्ष्मण जी को प्रोत्साहित किया। उर्मिला जी ने 14 वर्षों तक कभी कोई श्रृंगार नहीं किया। उन्होंने जिस दीपक से आरती कर विदाई की, उसी दीपक को उन्होंने 14 वर्षों तक अखंड रूप से जला कर रखा और वनवास से वापसी के बाद उसी दीपक से उनका स्वागत किया। माता कौशल्या राजतिलक छोड़ू वनवास जाते देख दुखी हो गईं। उन्होंने सजते राजतिलक के पहले भगवान को खिलाने के लिए पकवान तैयार किये थे, सब धरे रह गये। उन्होंने राम जी से कहा, कैकेयी मेरी सौत नहीं, वह तुम्हारी माँ है। राम भगवान वनगमन के पूर्व माता कौशल्या के कक्ष से मिलने गये। तब उन्होंने उन्हें जननी कह कर संबोधित किया। माता सीता को पुनः समझाने का प्रयास किया, किंतु उन्होंने कहा कि पति के बिना पत्नी का कोई अस्तित्व नहीं होता। जब प्राण ही नहीं रहेगा तो शरीर का क्या अस्तित्व है। प्रभु, मैं आपकी छाया हूँ, सदैव आपके साथ चलती हूँ। अंततः भगवान राम भ्राता लक्ष्मण और सीता जी के साथ वन के लिये प्रस्थान कर गये। रास्ते पर लोगों की भीड़ उन्हें देखने के लिये और स्वागत के लिये खड़ी थी। वन क्षेत्रों के पेड़-पौधे, जीव-जंतु भी अपने भाग्य को संवार रहे थे। उन्हें अति निकट से भगवान राम, लक्ष्मण और सीता जी का दर्शन करने को मिल रहा था। रास्ते में भगवान एक पर्ण कुटीर में रुके। दूसरे दिन वे प्रस्थान किये, तब उन्हें गंगा जी को पार कर आगे जाना था। महाराज ने आगे बताया कि गंगा जी के तट पर खड़े थे, तब भगवान राम को उनका परिचित निषादराज मिल गया। गंगा पार कराने के लिये निषादराज अपने राज्य से एक केवट को बुलाते हैं। वह केवट भगवान राम को भली-भाँति जानता था। वह नित्य अपनी पत्नी के साथ भगवान की पूजा करता था। राम, लक्ष्मण और केवट प्रसंग को इन्होंने इतने मधुर ढंग से सुनाया कि श्रोता क्षण भर भगवान राम के साथ गंगा में गोता लगाने लगे। केवट ने देखा कि दुनिया को भवसागर पार कराने वाले श्रीहरि भगवान राम स्वयं केवट के सामने गंगा पार करवाने के लिये खड़े हैं, तब वह समझ गया कि अब मेरा भी उद्धार होने वाला है। भगवान ने जब केवट से गंगा पार कराने को कहा तो केवट ने उन्हें मना कर दिया। संत श्री ने कहा कि केवट ने सुना था कि श्रीराम के चरण अद्भुत हैं, उनके चरण पड़ते ही शिला नारी में बदल जाती है। उनके चरणों की धूल चमत्कारों से भरी हुई है, इसीलिये लोग  उनके चरणों की धूल पाने को लालायित रहते हैं। इसलिये केवट ने सोचा, मैं पहले इनके चरणों की धूल को जल से धोऊँगा, फिर इन्हें नाव में बिठा कर गंगा पार कराऊँगा। केवट के द्वारा चरण पखारने की हठ पर लक्ष्मण जी भी कोचित हो गये थे। लेकिन भगवान मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। केवट को डर सता रहा था, मेरी नाव काष्ठ की है, यदि यह आपके चरण पड़ते ही किसी अन्य रूप में बदल गई तो मेरी आजीविका ही चली जायेगी। मैं कैसे अपने परिवार का भरण-पोषण करूँगा। तब भगवान राम को अंततः केवट के हठ के सामने झुकना पड़ा और उन्होंने पैर धोने  की अनुमति दे दी। इतना सुनते ही केवट ने अपनी पत्नी से जल का एक पात्र मँगाया। गंगा के पानी से प्रभु श्रीराम के पैर पखारने लगा। उनके चरण धोकर उसे ग्रहण भी किया। इसके पश्चात केवट ने प्रभु श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता को अपनी नाव में बैठाकर खुशी-खुशी गंगा के उस पार पहुँचा दिया। संत श्री ने बताया कि अपना उद्धार लेने के बाद उस पार पहुँचते ही केवट ने भगवान से कहा कि हम दोनों एक ही बिरादरी के हैं। तब केवट ने हँसकर उत्तर दिया, आप लोगों को भवसागर पार कराते हैं और मैं गंगा पार कराता हूँ। आपके दर्शन, स्पर्श से मेरा जन्म-जन्म का पाप मिट गया और मुझे मोक्ष मिला। महाराज ने बताया कि भगवान राम 14 वर्षों के वनवास में सबसे ज्यादा समय 13 वर्षों तक चित्रकूट में रहे। चित्रकुटधाम पंहुचने पर भगवान राम से मिलने सबसे पहले देवता आये । उन्होंने कहा कि अपने स्वार्थ के लिए हम लोगों ने ही आपका वनवास  कराया क्योंकि राक्षस गणो से हम लोग काफी त्रस्त हैं। इसके पश्चात ऋषि मुनिगण आये भगवान राम में सभी देवताओ और ऋषि मुनियों को प्रणाम किया। भगवान से  मिलने इस क्षेत्र में निवास करने वाले कोल भील भी आये  जो अपने साथ काफी फल फूल लेकर आये थे। उनके नेत्र अश्रु से भीगे हुए थे। भगवान श्री राम ने कहा कि देवता ऋषि मुनि सब फल मांगने आये किंतु मे सीधे साधे भोले भाले भील देने के लिये फल लेकर आयें हैं। भगवान राम सीताजी के साथ विचरण के निकले तक देखा एवं लता वृद्ध के सहारे चारों ओर फैलकर वृक्ष  को हरा भराबना दिया है उन्होंने सीता जी से पूछा कि भाग्यशाली कौन है लता या वृक्ष  सीता जी ने कहा कि यदि वृक्ष सहारा नहीं देता तो लता कैसे फैलती। तब उन्होंने इस प्रश्न का उत्तर लक्ष्मण जी से पूछा तो लक्ष्मण जी ने कहा कि भाग्यशाली तो मैं हूं जो लता  और वृक्ष दोनों  की छाया में साथ हूं। कार्यक्रम के प्रारंभ में मुख्य संरक्षक श्री अमर अग्रवाल,श्रीमती शशि अग्रवाल, गुलशन ऋषि, गोपाल शर्मा,युगल शर्मा, उड़िया एसोसिएशन रेलवे, सुदर्शन समाज, डूमार समाज, पंजाबी हिंदू महिला संस्था, तमिल समाज, माहेश्वरी समाज, गाहोई वैश्य समाज, जिला भोई समाज, छत्तीसगढ़ क्षत्रिय आदिवासी समाज, मेहर समाज, कंवर समाज, कच्छवाहा समाज, अघरिया समाज और राजपूत क्षत्रिय समाज कार्यक्रम के अंत में श्री अमर अग्रवाल, श्रीमती शशि अग्रवाल, श्री बृजमोहन अग्रवाल, संगठन महामंत्री भाजपा श्री पवन साय, सांसद रूपकुमारी चौधरी, केबिनेट मंत्री राजेश अग्रवाल, संसद कमलेश जांगड़े, श्रीमती मीना साव, श्रीमती मंजू श्रीनिवास खेडिया, श्री लखन लाल साहू, श्री रजनीश सिंह, श्री पवन अग्रवाल आदि आरती में सम्मिलित थे।

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