नवरात्र का योग एवं आध्यात्मिक दृष्टि से है अपना महत्व

भोपाल. आदर्श योग आध्यात्मिक केन्द्र  स्वर्ण जयंती पार्क कोलार रोड भोपाल के संचालक एवं योग गुरु महेश अग्रवाल ने चैत्र नवरात्र  ,गुड़ी पड़वा एवं हिन्दू  नव वर्ष  संवत्सर की बधाई एवं शुभकामनायें देते हुए  कहा कि  यह पर्व हमें योग,आध्यात्म, आत्म शुद्धि,  एवं अनुशासन की शिक्षा के साथ  साधना करने का अवसर देता है | इस पर्व से सभी के जीवन में परिवर्तन एवं पुरे संसार में स्वास्थ्य,खुशहाली एवं शान्ति होगी |
चैत्र नवरात्र के पहले द‌िन आद‌िशक्त‌ि प्रकट हुई थी, ब्रह्मा जी  ने सृष्ट‌ि न‌िर्माण का काम शुरु क‌िया । इसल‌िए चैत्र शुक्ल प्रत‌िपदा से ह‌िन्दू नववर्ष शुरु होता है। पुराणों के अनुसार पूरे साल में चार नवरात्र मनाए जाते हैं  सभी नवरात्र का आध्यात्म‌िक दृष्ट‌ि से अपना महत्व है। इस दौरान देवी की पूजा होती है। नवरात्र के नौ द‌िनों में लोग व्रत रख अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए भगवान से वरदान मांगते हैं। शारदीय नवरात्र वैभव और भोग प्रदान देने वाले है। गुप्त नवरात्र तंत्र स‌िद्ध‌ि के ल‌िए व‌िशेष है जबक‌ि चैत्र नवरात्र आत्मशुद्ध‌ि और मुक्त‌ि के ल‌िए। इसल‌िए धार्म‌िक  एवं आध्यात्मिक दृष्ट‌ि से चैत्र नवरात्र का बहुत महत्व है। ज्योत‌िषशास्त्र में चैत्र नवरात्र का व‌‌िशेष महत्व है क्योंक‌ि इस नवरात्र के दौरान सूर्य का राश‌ि परिवर्तन होता है। सूर्य 12 राश‌ियों में भ्रमण पूरा करते हैं और फ‌िर से अगला चक्र पूरा करने के ल‌िए पहली राश‌ि मेष में प्रवेश करते हैं। सूर्य और मंगल की राश‌ि मेष दोनों ही अग्न‌ि तत्व वाले हैं इसल‌िए इनके संयोग से गर्मी की शुरुआत होती है।

इस अवसर पर योग गुरु अग्रवाल ने बताया कि योग की अनुभूति में शक्ति सर्वोच्च है, क्योंकि शक्ति की अन्तक्रीडा से ही ब्रह्माण्डीय नियम परिचालित है। यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड शक्ति एवं चेतना अर्थात् शिव और शक्ति की लीलाओं का परिणाम है। एक योगी के लिए महत्त्व भौतिक शरीर का नहीं, बल्कि शक्ति के उस स्वरूप और परिमाण का है जो शरीर को गतिशील बनाता है. मन को उत्प्रेरित करता तथा चेतना को उन्नत बनाता है।  शक्ति का ध्रुवीकरण होता है, यह या तो आकृष्ट करती है या विकर्षित करता है; यह या तो सकारात्मक होती है या नकारात्मक। चुम्बकों के उत्तर एवं दक्षिण ध्रुवों या बिजली के धनात्मक तथा ऋणात्मक छोरों पर यह प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है। यह अस्तित्व शिव एवं शक्ति, अर्थात् चेतना  एवं शक्ति की सहज लीला का प्रतिरूप है। जीवन, ऊर्जा तथा पदार्थ की सृष्टि तब तक सम्भव नहीं, जब तक धनात्मक ऋणात्मक अथवा सकारात्मक नकारात्मक शक्तियों का आपस में मिलन न हो। स्त्री-पुरुष के विभिन्न सामाजिक और व्यक्तिगत सम्बन्ध शिव-शक्ति की विकासात्मक लीला के प्रतिरूप हैं।

योग एवं आध्यात्म के इतिहास में स्त्रियाँ सदा बहुसंख्यक रही हैं। किसी भी सभा में गिनती करें, किसी योग कक्षा, सत्संग या आश्रम में जायें, वहाँ आप पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों को ही अधिक पायेंगे। वस्तुतः आध्यात्मिक आन्दोलन में अधिक स्त्रियों की संलग्नता कोई नई बात नहीं है, बल्कि यह आधुनिक पुनर्जागरण है। योग के इतिहास के प्रारम्भ से ही स्त्रियों की प्रमुख भूमिका रही है, उनमें से अनेक तो सन्त और गुरु भी हुई हैं। शिव को तन्त्र एवं योग का अधिष्ठाता एवं गुरु भी माना जाता है। उनके प्रथम शिष्य थे पार्वती, उनकी प्रतिरूप पत्नी या शक्ति। यदि आप तन्त्र की पुस्तकें पढ़ें तो पायेंगे कि उनका आरम्भ ‘पार्वती ने पूछा’ से ही होता है। इस प्रकार तन्त्र और योग का ज्ञान सर्वप्रथम एक स्त्री को ही प्रदान किया गया। योग की संस्कृति में जब किसी सम्बन्ध का उल्लेख किया जाता है तो पहले स्त्री का नाम लिया जाता है। हम ‘राम-सीता’ नहीं, बल्कि ‘सीता-राम’, या ‘कृष्ण-राधा’ नहीं, बल्कि ‘राधा-कृष्ण या शंकर-गौरी’ नहीं बल्कि ‘गौरी-शंकर’ कहते हैं। आदर्श योग आध्यात्मिक केन्द्र कई वर्षो से निःशुल्क योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा के बारे में जानकारी एवं प्रशिक्षण देकर लोगों को जागरूक कर स्वस्थ जीवन जीने की कला सीखा रहा हैं |  वर्तमान में कोविड 19 के दौरान बिना कोई अवकाश के ऑनलाइन माध्यम से निःशुल्क प्रशिक्षण दिया  जा रहा हैं |

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