एकत्‍व की प्राप्ति है पुरुषार्थों का लक्ष्‍य : प्रो. शास्‍त्री

वर्धा. बौद्ध भारतीय ज्ञान अध्‍ययन विश्‍वविद्यालय सांची के पूर्व कुलपति प्रो. यज्ञेश्‍वर शास्‍त्री ने कहा है कि एकत्‍व की प्राप्ति सभी पुरुषार्थों का लक्ष्‍य है। प्रो. शास्‍त्री आज म‍हात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में भारतीय दर्शन महासभा के 95वें अधिवेशन तथा एशियाई दर्शन सम्‍मेलन के दूसरे दिन 28 दिसंबर को ‘भारतीयदर्शने-युगानुकूल-पुरुषार्थमीमांसा’ विषयक शास्‍त्रार्थ में अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य दे रहे थे। शास्‍त्रार्थ में भारतीय दर्शन परिषद् के अध्‍यक्ष प्रो. एस.आर. भट्ट, भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद्, नई दिल्‍ली के सदस्‍य सचिव प्रो. सच्चिदानंद मिश्र, एसआईजीएसीटीके बेंगलुर के निदेशक डॉ. धनंजय राव, केंद्रीय संस्‍कृत विवि के डॉ. गणेश ईश्‍वर भट्ट, कविकुलगुरु कालि‍दास संस्‍कृत विवि, रामटेक के डॉ. श्रीनिवास शास्‍त्री, कविकुलगुरु कालि‍दास संस्‍कृत विवि, रामटेक के कुलपति प्रो. मधुसूदन पेन्‍ना, हरी सिंह गौर विश्‍वविद्यालय, सागर के प्रो. अंबिकादत्त शर्मा, श्रीलंका के अमृतानंद, श्री सचिन त्रिवेदी और हिंदी विश्‍वविद्यालय के डॉ. के.सी. पांडेय ने भाग लिया । प्रो. यज्ञेश्‍वर शास्‍त्री ने कहा कि मोक्ष स्‍व का वास्‍तविक बोध है।

प्रो. मधुसूदन पेन्‍ना ने शास्‍त्रार्थ की शुरूआत करते हुए क‍हा कि पुरुषार्थ एक स्‍थापित विचार है और यह युगानुकूल भी है। पुरुषार्थ व्‍यवस्‍था आश्रम व्‍यवस्‍था के अनुरूप है। इस युग में यह कैसे और किस प्रकार से बदल गया इसके पहलुओं पर उन्‍होंने विचार रखे। उन्‍होंने कहा कि आज के परिप्रेक्ष्‍य में पुरुषार्थ का सत्‍यापन जरूरी है। अध्‍येता सचिन द्विवेदी ने मोक्ष को ही पुरुषार्थ कहा तथा मोक्ष के लिए धर्म, अर्थ और काम आवश्‍यक बताया। उन्‍होंने ऋग्वेद का उल्‍लेख करते हुए वेदांत विद्या, आत्‍मज्ञान, अज्ञाननिवृत्ति आदि पर विस्‍तार से चर्चा की। प्रो. सच्चिदानंद मिश्र ने कहा कि काम सबसे प्रमुख पुरुषार्थ है और अर्थ गौण पुरुषार्थ है। उन्‍होंने कहा कि उच्‍च विद्या ही मोक्ष है। भारतीय दर्शन महासभा के अध्‍यक्ष प्रो. एस. आर. भट्ट ने कहा कि भारतीय दर्शन संबंधी अपने विवेचन से श्रोताओं को च‍कित कर दिया। श्रीनिवास शास्‍त्री ने कहा कि धर्म, कर्म और अर्थ वस्‍तुत: परम पुरुषार्थ यानी मोक्ष को प्राप्‍त करने के पाथेय है। डॉ. धनंजय राव ने भारतीय दर्शन के आलोक में पुरुषार्थों का विवेचन किया। डॉ. कृष्‍ण चंद पाण्‍डेय ने बौद्ध दर्शन के आलोक में पुरुषार्थ पर अपने विचार रखे। भंते अमृतानंद अमितानंद स्‍वामी ने कहा कि मनुष्‍य अपने कर्म से ही अपने भाग्‍य का निर्धारण करता है। गणेश ईश्‍वर भट्ट ने पुरुषार्थ मीमांसा के विभिन्‍न पहलुओं पर अपने विचार रखे।

अंबिकादत्त शर्मा ने कहा कि पुरुषार्थ मीमांसा को धर्मशास्‍त्रीय दृष्टि से ही समझा जा सकता है। उन्‍होंने पुरुषार्थ संतुलन का भाष्‍य प्रस्‍तुत किया। शास्‍त्रार्थ में हिस्‍सा लेने वाले विद्वानों के प्रति आभार प्रकट करते हुए कुलपति प्रो. रजनीश कुमार शुक्‍ल ने कहा कि पुरुषार्थ चतुष्‍टय भारतीय सभ्‍यता दृष्टि के केंद्र में है। कार्यक्रम का संचालन संस्‍कृत विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. जगदीश नारायण तिवारी ने किया।

 

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