बिहार में शराबबंदी को लेकर मुख्यमंत्री के सहयोगी क्यों कर रहे बैन हटाने की मांग?
पटना: बिहार में शराबबंदी को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब विपक्ष से ज्यादा अपनी ही पार्टी और गठबंधन सहयोगियों के निशाने पर हैं. साल 2016 में लागू की गई पूर्ण शराबबंदी को नीतीश कुमार आज भी सामाजिक सुधार और महिलाओं की सुरक्षा से जोड़कर देखते हैं, जबकि एनडीए के कई नेता इसे राज्य के लिए आर्थिक और प्रशासनिक बोझ मानने लगे हैं. दिलचस्प यह है कि जहां मुख्यमंत्री शराबबंदी जारी रखने पर अड़े दिखते हैं, वहीं उनके सहयोगी दल समय-समय पर इसे हटाने या कम से कम इसकी समीक्षा की मांग करते रहे हैं.
शराबबंदी लागू करते समय नीतीश कुमार ने इसे महिलाओं की मांग बताया था. सरकार का दावा था कि शराब के कारण घरेलू हिंसा, पारिवारिक झगड़े और गरीबी बढ़ रही थी. शराबबंदी के बाद महिला एवं बाल विकास विभाग और पुलिस के आंकड़ों के अनुसार, शुरुआती दो से तीन वर्षों में घरेलू हिंसा और महिला उत्पीड़न से जुड़े मामलों में करीब 12 से 18 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई. महिला हेल्पलाइन पर आने वाली शिकायतों में भी कमी आई. यही आंकड़े नीतीश कुमार के लिए शराबबंदी का सबसे मजबूत आधार बने हुए हैं.


