बेहद दिलचस्प है भारत में सिनेमा आने की कहानी, 124 साल पहले देखी गई थी पहली फिल्म


नई दिल्ली. कुछ तारीखें इतिहास में दर्ज की जाती हैं. 7 जुलाई भी एक ऐसी ही खास तारीख है, जिन फिल्मों को बड़े पर्दे पर देखने के लिए आप इतने बेसब्र रहते हैं, इतिहास में आज ही का दिन उस सिनेमा (cinema) के नाम दर्ज है.

भारत में सिनेमा
7 जुलाई 1896 को भारतीयों ने गलती से सिनेमा (cinema) देख लिया था और इसकी कहानी बेहद दिलचस्प है. दरअसल, फ्रांस में जन्मे ल्यूमियर ब्रदर्स (Lumiere brothers) ने चलती फिल्में बनाई थीं, जिन्हें वे पूरी दुनिया में दिखाना चाहते थे. इसकी शुरुआत उन्होंने ऑस्ट्रेलिया से करने की ठानी थी और इसी के लिए अपने एजेंट मॉरिस सेस्टियर को ऑस्ट्रेलिया रवाना किया था. भारत के मुंबई शहर (तब, बंबई) पहुंचने पर एजेंट मॉरिस को पता चला कि ऑस्ट्रेलिया जाने वाला हवाई जहाज में कुछ खराबी आ जाने की वजह से वह अब उड़ान नहीं भर पाएगा. ऐसे में उन्होंने सोचा कि क्यों न ये फिल्में भारत में ही प्रदर्शित कर दी जाएं. इसके लिए उन्होंने ल्यूमियर ब्रदर्स से बात की और उन्हें भी यह बात जंच गई.

2 रुपये के टिकट से हुई शुरुआत
आज आप जिन फिल्मों को थिएटर में कई सौ रुपये का टिकट खरीदकर देखते हैं, 7 जुलाई 1896 को उन्हें महज 2 रुपये में दिखाया गया था. एजेंट मॉरिस मुंबई के वॉटसन होटल में ठहरे थे और उन्होंने यहीं स्क्रीनिंग करवाने का फैसला किया था. इस स्क्रीनिंग के पहले दिन तकरीबन 200 लोगों ने वहां सिनेमा का आनंद लिया था. वहां 7 से 13 जुलाई तक फिल्मों को चलाया गया था और दर्शक सिनेमा नाम के उस चमत्कार को देख अभिभूत हो गए थे. उसके बाद इन फिल्मों को मुंबई के नॉवेलटी थिएटर में भी दिखाया गया था.

दुनिया का अजूबा
7 जुलाई 1896 को दिखाए गए सिनेमा को दुनिया का अजूबा कह कर प्रचारित किया गया था. 124 साल पहले 6 जुलाई 1896 को मॉरिस एक प्रचलित अखबार के ऑफिस गए थे और 20वीं सदी के इस चमत्कार का विज्ञापन दिया था. उस विज्ञापन में सिनेमा को दुनिया का अजूबा कहा गया था. विज्ञापन देखकर ही मुंबई के कोने-कोने से लोगों का हुजूम वॉटसन होटल तक पहुंच गया था. बात करें ल्यूमियर ब्रदर्स की तो दोनों फ्रांस में जन्मे थे और इनकी साइंस में विशेष दिलचस्पी थी. इन्होंने फोटोग्राफी के नए औजार का आविष्कार किया था, जिसके बाद में सिनेमैटोग्राफ का पदार्पण हुआ था. 18 अप्रैल 1895 में दोनों भाइयों ने दुनिया भर में इसे पेटेंट करवाने के लिए अर्जी दे दी थी. 7 जुलाई 1896 को भारत में अगर संयोगवश सिनेमा न दिखाया गया होता तो शायद भारतीय मनोरंजन के सबसे बड़े जरिए से लंबे समय तक वंचित रह जाते.

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