भारत के इस पड़ोसी देश के हजारों लोगों ने कोरोना के बारे में सुना तक नहीं!
नई दिल्ली. ऐसे समय जब कोरोना वायरस (coronavirus) महामारी पूरे विश्व में तांडव कर रही हो, लाखों लोगों के संक्रमित होने और मौत की खबरें आम हों, ऐसे वक्त में अगर कोई ये कहे कि वो कोरोना वायरस को नहीं जानता, तो हैरान होना स्वाभाविक है. म्यांमार (Myanmar) के सुदूर-पश्चिम में लड़ाई के चलते लाखों लोग फंसे हुए हैं और एक साल से इंटरनेट बंद होने की वजह से वो कोरोना वायरस के बारे में कुछ भी नहीं जानते.
पिछले साल जून में, राज्य काउंसलर आंग सान सू केई के नेतृत्व वाली म्यांमार सरकार ने इस क्षेत्र की 9 टाउनशिप के लिए इंटरनेट बंद कर दिया था. उन्हें इस बात का डर था कि इंटरनेट के इस्तेमाल से म्यांमार सेना और विद्रोहियों के बीच तनाव को बढ़ावा दिया जा रहा था. हालांकि मई में इनमें से एक टाउनशिप की इंटरनेट सेवा बहाल कर दी गई थी, लेकिन बाकी 8 आठ टाउनशिप जिनकी कुल आबादी करीब 8 लाख है वो सूचना और जानकारियों से महरूम रहे.
ह्यूमन राइट्स वॉच और एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि ये शटडाउन लोगों की जिंदगियों को खतरे में डाल रहा है, सिर्फ इसलिए नहीं कि ये लोगों को संभावित मानवाधिकारों के दुरुपयोग की रिपोर्ट करने से रोक रहा है, बल्कि इसलिए भी कि इससे वो कोरोना वायरस महामारी से जुड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियानों से कट गए हैं. ह्यूमन राइट्स वॉच में एशिया की कानूनी सलाहकार लिंडा लखधीर ने एक बयान में कहा- ‘कोरोना वायरस महामारी के दौरान, रखाइन राज्य में म्यांमार सेना और अराकान सेना के बीच सशस्त्र संघर्ष के चलते, नागरिकों को सुरक्षित रहने के लिए आवश्यक जानकारी मिलना बेहद जरूरी है.’
म्यांमार के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, सोमवार तक म्यांमार में 64,532 से ज्यादा टेस्ट किए गए जिसमें 292 लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए और 6 लोगों की मौत हुई. बाकी देशों की तरह, म्यांमार ने भी कोरोना वायरस के प्रसार को नियंत्रित करने के लिए कर्फ्यू, बड़े आयोजनों पर प्रतिबंध, और बाहर से आने वाले लोगों को क्वारेंटाइन करने जैसे उपाए किए हैं. नियमों का पालन नहीं करने वाले लोगों के लिए सरकार ने सजा का भी प्रावधान रखा है. इसमें क्वारेंटाइन आदेशों को नहीं मानने वालों के लिए जेल की सजा भी शामिल है. बच्चों सहित कम से कम 500 लोगों को एक साल तक जेल की सजा सुनाई गई है.