October 15, 2022
विश्व गठिया दिवस – कार्यक्षेत्र में प्रगति के लिए मानसिक रूप से स्वस्थ होना भी अनिवार्य है : योग गुरु महेश अग्रवाल
भोपाल. आदर्श योग आध्यात्मिक केंद्र स्वर्ण जयंती पार्क कोलार रोड़ भोपाल के संचालक योग गुरु महेश अग्रवाल ने बताया कि हर साल 12 अक्टूबर को विश्व गठिया दिवस के रूप में मनाया जाता है। गठिया एक ऐसी बीमारी है जो आपके जोड़ों को प्रभावित करती है (ऐसे क्षेत्र जहां आपकी हड्डियां मिलती हैं और चलती हैं) । गठिया में आमतौर पर आपके जोड़ों में सूजन या अध: पतन (टूटना) शामिल होता है । इस रोग में जोड़ों में गांठें बन जाती हैं और शूल चुभने जैसी पीड़ा होती है। नाड़ी की गति तेज हो जाती है, ज्वर होता है, वेगानुसार संधिशूल में भी परिवर्तन होता रहता है, लेकिन कुछ सावधानी बरत कर ऐसे असहनीय दर्द और गठिया जैसी बीमारी से मुक्ति पा सकते हैं।ऑस्टियोआर्थराइटिस शायद गठिया का सबसे आम और प्रचलित प्रकार है। यह आमतौर पर उम्र के साथ होता है और उंगलियों, घुटनों और कूल्हों को प्रभावित करता है। अन्य प्रकार के आमवाती रोगों में गाउट, ल्यूपस, फाइब्रोमायल्गिया और सेप्टिक गठिया शामिल हैं। गठिया की उत्पत्ति ग्रीक शब्द ‘आर्थ्रो’ से हुई है जिसका अर्थ है जोड़ और सूजन के लिए ‘इटिस’, जो जोड़ों की सूजन का अनुवाद करता है; रोग का एक लक्षण। रीढ़ की हड्डी के जोड़ों सहित कोई भी जोड़ इससे प्रभावित हो सकता है, परन्तु हाथों तथा पैरों के जोड़ सर्वाधिक प्रभावित होते हैं। प्रारंभ में, अस्पष्ट या क्षणभंगुर दर्द हो सकता है; यह प्रातः काल तथा दिन की समाप्ति पर बढ़ सकता है। महिलाओं में पुरुषों से अधिक इस रोग की प्रवृत्ति होती है। बच्चे भी इससे पीड़ित हो सकते हैं। अन्य प्रकार के आर्थराइटिस की अपेक्षा गठियाग्रस्त आर्थराइटिस सामान्यतया आरंभिक आयु में प्रभावित करता है। यह जाड़े के महीनों में होता है। अमेरिकी लोग इस रोग से स्वाभाविक रूप से पीड़ित रहते हैं। ताजे कच्चे फलों तथा सब्जियों के रस गठियाग्रस्त आर्थराइटिस के अद्भुत उपचार हैं। ऐसा माना जाता है कि लहसुन, मुसम्बी, संतरा, गाजर तथा चुकंदर के रस का पर्याप्त मात्रा में सेवन करना इस रोग का शीघ्र उपचार है।
योग गुरु अग्रवाल ने इस अवसर पर बताया योग का मनोदैहिक पक्ष अति महत्त्वपूर्ण है। यह प्राचीन विज्ञान मानव को मात्र एक जैव इकाई नहीं मानता। प्राचीन चिन्तकों ने मन के कार्यों और उसकी आन्तरिक संरचना पर अधिक ध्यान दिया है। आज, मनोविज्ञान ने भी अपने शोध क्षेत्र में इस मौलिक पक्ष को स्वीकार किया है और शरीर एवं मन के अन्तर्सम्बन्धों को अधिक से अधिक समझ रहा है।अतः यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि किसी भी कार्य-क्षेत्र में मनुष्य की प्रगति के लिए न केवल उसको शारीरिक रूप से स्वस्थ होना चाहिए, वरन् उसका मानसिक रूप से स्वस्थ होना भी अनिवार्य है। योग के क्षेत्र में मानव की उच्चतम प्रगति के लिए उसके स्वस्थ और समन्वित व्यक्तित्व के विकास को योग ने सदा ही अपना लक्ष्य माना है। अतः यह कोई आश्चर्यजनक बात नहीं कि महर्षि पतञ्जलि अपनी अष्टांग-योग-पद्धति में दोनों पक्षों-बहिरंग और अन्तरंग को योग की पूर्णता के लिए आवश्यक मानते हैं। प्रथम कोटि में आते हैं-यम, नियम, आसन और प्राणायाम तथा द्वितीय कोटि में आते हैं -प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
प्रथम चार शारीरिक स्वास्थ्य के मौलिक तत्त्व हैं। यम, नियम, आसन और प्राणायाम सबके शारीरिक स्वास्थ्य के चार आधार स्तम्भ हैं। फिर हठयोग छः शुद्धिकारक तकनीकों, नेति, धौति, बस्ति, नौलि, त्राटक और कपालभाति को षट्कर्म के रूप में रखता है। ये सभी शारीरिक स्वास्थ्य विज्ञान की महत्त्वपूर्ण तकनीकें हैं। प्राचीन योग विज्ञान ने मेरुरज्जु और मस्तिष्क को केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र के अवयव के रूप में माना है तथा उनको स्वस्थ रखने पर बल दिया है। योग में अन्तःस्रावी ग्रन्थियों की समुचित क्रियाशीलता और शरीर की रासायनिक प्रतिक्रियाओं को भी महत्त्वपूर्ण माना गया है। अतएव साधक प्रसन्नता से अपने जीवन के स्वैच्छिक नियमन के लिए तैयार हो जाता है। इसका यह अर्थ नहीं है कि उस समय वह अपने जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं को अस्वीकार कर अपनी सहज प्रवृत्तियों का दमन करता है, अपितु वह एक उच्च प्रयोजन हेतु अपनी इन सहज प्रवृत्तियों के रूपान्तरण के लिए सतत् परिश्रमपूर्ण प्रयास करता है।
अतः शरीर को स्वस्थ एवं चुस्त-दुरुस्त रखने के लिए आसन, प्राणायाम और मुद्रा मुख्य विधियाँ हैं। ये स्वास्थ्य के मुख्य आधार हैं, क्योंकि योग में लम्बे काल तक एक ही स्थिति में बैठकर भी अभ्यास करना होता है। आसन केवल शारीरिक व्यायाम नहीं हैं, बल्कि विभिन्न शारीरिक स्थितियाँ हैं जो मांसपेशियों को प्रभावित करती हैं। योग में पेशीय बल का अधिक महत्त्व नहीं है और शरीर को केवल एक यंत्र माना गया है। योगाभ्यास में थकावट, क्लान्ति, आलस्य आदि से दूर रहा जाता है। प्रयास तो यही रहता है कि मन सदा प्रसन्न रहे। आसन वह तकनीक है जिसका प्रतिदिन अभ्यास कर समस्त मानव तन्त्र को स्वास्थ्य एवं पुनर्जीवन प्रदान किया जा सकता है।*