राजनीतिक दलों को महामारी रोकने एक जुट होना होगा

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बिलासपुर/ अनीश गंधर्व. कोरोना काल का अंत एक दूसरे के मदद के बिना संभव नही है। राजनीति करने का नही, कुछ कर गुजरने का समय आ गया है। किसी पर आरोप मढ़ने से समस्या का हल नही होने वाला है और यह सब भली भांति जानते हैं, इसके बाद भी व्यवस्था सुधारने पर जोर नही दिया जा रहा है। सरकारी अमला कोरोना उत्सव मनाने में तुला हुआ है। मरीजों के उपचार से लेकर मृतकों के दाह संस्कार तक कमाई का खेल शुरू हो गया है। बिलासपुर में जिस ढंग से शवो का दाह संस्कार किया जा रहा है वह निंदनीय है। महज दो क्विंटल लकड़ी में दाह संस्कार किया जा रहा है, जबकि इसके बदले में साढ़े तीन हजार लिया जा रहा, अंतिम संस्कार में शामिल होने वालों को किट का भी शुल्क अदा करना पड़ रहा है। शव को चिता तक ले जाने दलाल सक्रिय हैं। आलम यह है कि अस्पताल से शवो को मुक्तिधाम तक ले जाने तक वाहन उपलब्ध नहीं है। ऐसे मे निजी वाहन मालिक भी तोरवा व राजकिशोर नगर का किराया पांच हजार तक वसूल रहे हैं।

सरकारी अमले के भरोसे चल रहे कामकाज का नतीजा सभी देख रहे हैं। लोग यह भी समझ रहे हैं कि घुटने भर कीचड़ से गुजरने के लिए कमर तक जूता नहीं पहना जा सकता। नया रास्ता फिलहाल दूर दूर तक नजर नही आ रहा है। ऐसे में एक दूसरे का मनोबल बढ़ाने की जरुरत है, समस्या भी विकराल है। राज्य में कांग्रेस की सरकार है तो केंद्र में भाजपा बैठी है, दोनों पक्षों के मजबूत होने के बाद भी चिकित्सा व्यवस्था के नाम लूट खसोट का खेल क्यो खेला जा रहा है? किसके इशारे पर निजी अस्पताल के संचालक काम कर रहे हैं। राज्य में बिगड़ी स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारने और कोरोना से जान गवाने वाले मृतकों के परिजनों से अमानवीय व्यवहार रोकने राजनीति से हटकर मदद के लिए सभी राजनीतिक दलों को एक जुट होने जरूरत है। किसान आंदोलन और धान खरीदी पर एक दुसरे पर कीचड़ उड़ाने वाले नेता जब तक संकट की इस घडी में एक जुट होकर काम नही करेंगे तब तक सरकारी अमला हाथ मे आने वाला नही है।

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