विप्र स्मृति साहित्य संगम की पावस काव्य गोष्ठी में एक से एक रचना का पाठ
बिलासपुर. साईं आनंदम परिसर में इंजी. गजानंद पात्रे “सत्यबोध” की अध्यक्षता एवं विजय कल्याणी तिवारी के मुख्यातिथ्य में पावस गोष्ठी का आयोजन किया गया।गोष्ठी का संचालन हरवंश शुक्ल आभार प्रदर्शन राकेश अयोध्या ने किया।
गोष्ठी के पहले कवि अनमोल सिन्हा ने अपनी रचना इन पंक्तियों में पढ़ी- “नींद आएगी हमें और हम सो जाएंगे, आँख लगते ही तेरे ख़्वाब में खो जायेंगे ।”उन्होंने अपने शानदार तरन्नुम में उक्त गीत पेश किया।
राकेश पाण्डेय ने 14-14 मात्राओं पर आधारित श्रृंगारिक छंदबध्द गीत प्रस्तुत किया।ओम प्रकाश भट्ट जी नेइस रचना का पाठ किया- “देखो कितनी सुंदर छटा छाई है बरसात में। जुगुनुओं ने दीवाली, वनस्पतियों ने ईद, बादलों ने होली मनाई है बरसात में।” विजय कल्याणी तिवारी ने छत्तीसगढ़ी भाषा में अपना गीत प्रस्तुत किया जिसके बोल थे – “टप टप टपकत हे अँगना ओरवाती। छोटे छोटे जीव मन बने हे बराती।।
अमृत पाठक जी ने इन बोलों पर अपनी रचना प्रस्तुत की-“एक पल आओ हमारे प्यार की बातें करें। बाहुओं में बाहु हों, गलहार की बातें करें।।”
दिलेश्वर राव जाधव ने इन पंक्तियों में अपनी रचना का पाठ किया- “दिल है बेचैन मेरा तुम्हारे लिए, तुम समझ न सके तो, मैं क्या करूँ।”राकेश खरे की प्रस्तुति “जब-जब बादल घिर-घिर आते, मुझको लगता नवजीवन पाया।”श्री नरेंद्र शुक्ल “अविचल”इन पंक्तियों में अपनी रचना का पाठ किया, “ओ मेघ जरा तुम बरसकर जाना!”
बुधराम यादव.इन पंक्तियों से वाह वाही लूटी-“फिर जीने की ललक जगाता, है उनका मिलना। पतझड़ में भी सुमन खिलाता, है उनका मिलना।।”मित्र दिवस के अवसर पर प्रस्तुत इन पंक्तियों ने मित्रता की महिमा और उसके जीवनदायी पर प्रकाश डाला।
हरवंश शुक्ला की इन पंक्तियों ने कमाल किया- “ओ रोज बदलते रहे उठती दीवार की तरह। मैं रोज संभलता रहा इज्जतदार की तरह।।”
मयंकमणी दुबे की
प्रस्तुति शानदार रही है “तरसे कपोत को अब मुंडेर”आपकी इन पंक्तियों ने एक विरह और मिलन की प्रतीक्षा के सुंदर भाव को पाठकों के समक्ष रखा।
अध्यक्षीय उद्बोधन में इंजी. गजानंद पात्रे “सत्यबोध” द्वारा सभी साहित्यकारों की प्रस्तुतियों की बहुत ही सूक्ष्म और सराहनीय समीक्षा की गई। इसके पश्चात, कार्यक्रम के अंत में आपने मातृभाषा छत्तीसगढ़ी में ‘विष्णु पद छंद’ पर आधारित एक अत्यंत सुंदर श्रृंगारिक गीत प्रस्तुत किया-तोर रूप के मँय दीवाना, होगें हँव सुन ले।अपन बना ले मोला तँय हा, सँगवारी चुन ले।।”
इस अद्भुत अध्यक्षीय प्रस्तुति ने गोष्ठी में समां बांध दिया। अंत में राकेश अयोध्या द्वारा सभी का आभार व्यक्त करते हुए कार्यक्रम के सफल तापूर्वक संपन्न होने की घोषणा की गई।


