‘अमृत’ के दौर में लहूलुहान ‘कलम’: भारतीय लोकतंत्र के आहत प्रांगण से एक गद्य-क्रंदन वर्ष में एक बार जब राजधानी का आकाश तिरंगे के रंगों से सजता है और सरकारी उद्घोषकों के कंठ से ‘दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र’ की गाथाएँ फूटती हैं, तो प्रतीत होता है कि हम न्याय और समता के किसी