कविता कृष्णमूर्ति के सुरों से गूंजा चक्रधर समारोह, ‘चंदा चकोर’ ने बस्तर की माटी की कहानी सुनाई
०. जान कुमार सानू,आयुष नामदेव और सियाधेश बैंड ने बांधा समां
०. पुनर्वासित कलाकारों की प्रस्तुति ने छोड़ी अमिट छाप
०. समापन पर विकास के कई बड़े ऐलान
रायगढ़। 41वें अंतर्राष्ट्रीय चक्रधर समारोह की दसवीं एवं अंतिम संध्या बुधवार को संगीत, लोककला, रंगमंच और सांस्कृतिक विरासत के विविध रंगों से सजी रही। रामलीला मैदान में एक ओर पद्मश्री एवं प्रख्यात पाश्र्व गायिका कविता कृष्णमूर्ति की सुरमयी आवाज ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया, तो दूसरी ओर जान कुमार सानू और आयुष नामदेव के सियाधेश म्यूजिक बैंड ने लोकप्रिय गीतों से माहौल को संगीतमय बना दिया। वहीं नारायणपुर के नितारा कला केंद्र के कलाकारों ने ‘चंदा चकोर’ नाटक के माध्यम से बस्तर के लोकजीवन, प्रेम, परंपरा और संघर्ष को मंच पर जीवंत कर दिया।
समापन समारोह में प्रदेश के वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने दीप प्रज्ज्वलित कर अंतिम कड़ी का शुभारंभ किया। उन्होंने महाराजा चक्रधर सिंह की कला साधना और रायगढ़ घराने की सांस्कृतिक विरासत को नमन करते हुए कहा कि महाराजा चक्रधर सिंह ने अपने दौर में कला एवं संगीत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उनके संरक्षण से रायगढ़ घराने के कथक को देशभर में पहचान मिली और यह समारोह उसी गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाने का माध्यम है।
कविता के सुरों ने बांधा समां
अंतिम संगीत संध्या का विशेष आकर्षण पद्मश्री कविता कृष्णमूर्ति की प्रस्तुति रही। चार दशक से अधिक लंबे संगीत सफर में भारतीय सिनेमा को अनेक यादगार गीत देने वाली कविता कृष्णमूर्ति ने फिल्मी संगीत के साथ शास्त्रीय, भक्ति और समकालीन संगीत का खूबसूरत संगम प्रस्तुत किया। उनकी प्रस्तुति में ‘दिल दिया है जान भी देंगे ऐ वतन तेरे लिए’, ‘बोले चूडिय़ां, बोले कंगना’ सहित लोकप्रिय गीतों की गूंज देर तक रामलीला मैदान में सुनाई देती रही। उनकी भावपूर्ण आवाज और शास्त्रीय संगीत की मजबूत पकड़ ने दर्शकों को देर रात तक बांधे रखा। इससे पहले जान कुमार सानू ने अपनी सुरीली आवाज में लोकप्रिय गीतों की प्रस्तुति दी। ‘तू मिले दिल खिले’ जैसे गीतों से उन्होंने माहौल में संगीत का रंग घोला और अपने पिता एवं प्रसिद्ध गायक कुमार सानू की संगीत विरासत की झलक भी दिखाई।
आयुष नामदेव और सियाधेश बैंड ने भी जीता दिल
अंतिम कड़ी में आयुष नामदेव ने रायपुर के सियाधेश म्यूजिक बैंड के साथ शानदार प्रस्तुति दी। इंडियन आइडल से पहचान बनाने वाले आयुष विभिन्न संगीत एल्बमों का हिस्सा रह चुके हैं और छत्तीसगढ़ के कई प्रतिष्ठित मंचों पर अपनी गायकी का प्रदर्शन कर चुके हैं। उनकी सुमधुर आवाज और लोकप्रिय गीतों ने दर्शकों को खूब झुमाया। कविता कृष्णमूर्ति के साथ संजय मराठे एवं ओमकार देवस्कर ने की-बोर्ड, रिचर्ड मित्रा ने गिटार, सुरेश रामनाथन ने बास, विजय तांबे ने बांसुरी, गिरीश विश्व ने ढोलक, प्रसाद कुलकर्णी ने ड्रम, संकेत ओक ने तबला और सुप्रिया भट्टाचार्य ने कांगो पर संगत की। परिक्षित कुलकर्णी ने साउंड इंजीनियर के रूप में सहयोग किया।
‘चंदा चकोर’ में दिखा बस्तर का लोकजीवन
संगीत प्रस्तुतियों के साथ नारायणपुर के नितारा कला केंद्र के कलाकारों ने नाटक ‘चंदा चकोर’ का मंचन किया। बस्तर के सुदूर अंचल के जीवन, प्रकृति, परंपरा, प्रेम और संघर्ष को केंद्र में रखी इस प्रस्तुति ने दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ा।कहानी बस्तर के एक ऐसे गांव की है, जहां आधुनिक सुविधाओं का अभाव है, लेकिन प्रकृति, परंपरा और आपसी रिश्तों से जीवन समृद्ध है। गांव का युवक चकोर अपनी मां के साथ रहता है। खेती और जंगल पर निर्भर उसका जीवन तब बदलता है, जब बाजार में उसकी मुलाकात चंदा से होती है। दोनों के बीच प्रेम पनपता है और यही प्रेम चकोर को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने की ताकत देता है। नाटक की सबसे खास बात इसमें पुनर्वासित कलाकारों की सहभागिता रही। हिंसा और भटकाव का रास्ता छोडक़र मुख्यधारा में लौटे कलाकारों ने मंच पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। इससे प्रस्तुति को संवेदनशील और प्रेरक आयाम मिला।नाटक का लेखन एवं निर्देशन हीरा मानिकपुरी, संगीत गरिमा दिवाकर, सहायक निर्देशन अमन राय तथा मंच सज्जा एवं प्रकाश परिकल्पना अरुण भांगे ने की। इसमें 25 कलाकारों ने अभिनय किया, जबकि संगीत पक्ष में पांच कलाकार शामिल रहे। प्रस्तुति लगभग एक घंटा दस मिनट की रही।
पुनर्वासित कलाकारों को 51 हजार की सम्मान राशि
समापन समारोह में वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने कलाकारों का सम्मान किया। आयुष नामदेव एवं उनके बैंड को सम्मानित करने के साथ ही नारायणपुर से आए पुनर्वासित कलाकारों की प्रस्तुति की सराहना करते हुए उनके लिए 51 हजार रुपये की पुरस्कार राशि देने की घोषणा की।विशेष रूप से नक्सल संगठन में कमांडर रह चुकीं और पुनर्वास के बाद कला के माध्यम से समाज की मुख्यधारा से जुड़ीं चैती दीदी को उनकी कला प्रस्तुति के लिए शाल एवं श्रीफल भेंट कर सम्मानित किया गया।
रायगढ़ में दो करोड़ का कंटेंट क्रिएटर स्टूडियो
समापन अवसर पर वित्त मंत्री ने रायगढ़ के युवा कंटेंट क्रिएटर्स के लिए दो करोड़ रुपये की लागत से स्टूडियो निर्माण की घोषणा की। उन्होंने कहा कि आधुनिक संसाधनों से युक्त यह स्टूडियो स्थानीय युवाओं, कलाकारों और कंटेंट क्रिएटर्स को अपनी रचनात्मक प्रतिभा के लिए बेहतर मंच उपलब्ध कराने में मदद करेगा। उन्होंने कहा कि रायगढ़ की पहचान औद्योगिक विकास के साथ कला और संस्कृति की समृद्ध परंपरा से भी है। इसी दिशा में रायगढ़ में कला एवं संगीत महाविद्यालय की स्थापना की जाएगी। इसके लिए बजट में प्रावधान किया जा चुका है और प्रक्रिया आगे बढ़ रही है।
10 नए ऑक्सीजन गार्डन समेत विकास कार्यों का रोडमैप
वित्त मंत्री ने रायगढ़ के आगामी विकास कार्यों की जानकारी देते हुए कहा कि अगले पांच वर्षों में 10 नए ऑक्सीजन गार्डन विकसित करने का संकल्प लिया गया है। खर्रा घाट में करीब पांच एकड़ क्षेत्र में ऑक्सीजन गार्डन विकसित किया जाएगा। इसके अलावा राजू नगर में डेयरी, गजमार पहाड़ एवं नगर वन का विकास, खेल सुविधाओं का विस्तार, मरीन ड्राइव, कयाघाट पुल, केवड़ावाड़ी पुल, राजा महल के पास पुल और गोवर्धनपुर पुल सहित सडक़ चौड़ीकरण एवं रिंग रोड जैसे कार्यों को आगे बढ़ाने की बात कही गई। प्रयास विद्यालय, नवगुरु स्कूल, हॉर्टिकल्चर कॉलेज, फिजियोथेरेपी कॉलेज और नेचुरोपैथी कॉलेज जैसे कार्यों को भी विकास की आगामी योजनाओं में शामिल बताया गया। वित्त मंत्री ने बताया कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय भी समापन समारोह में शामिल होने वाले थे, लेकिन खराब मौसम के कारण उनका हेलीकॉप्टर उड़ान नहीं भर सका। मुख्यमंत्री ने उपस्थित नहीं हो पाने पर खेद व्यक्त किया।
चक्रधर समारोह रायगढ़ की सांस्कृतिक पहचान: सांसद
रायगढ़ लोकसभा सांसद राधेश्याम राठिया ने कहा कि 14 सितंबर से देशभर से आए ख्यात कलाकारों ने अपनी कला का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। उन्होंने चक्रधर समारोह को रायगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। राज्यसभा सांसद देवेंद्र प्रताप सिंह ने महाराजा चक्रधर सिंह की कला साधना और योगदान को याद करते हुए कहा कि उनके संरक्षण ने रायगढ़ को विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान दी। समारोह उसी गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाने का माध्यम है।महापौर जीवर्धन सिंह चौहान ने कहा कि चक्रधर समारोह केवल आयोजन नहीं, बल्कि रायगढ़ की कला,संस्कृति और गौरव की विशिष्ट पहचान है। उन्होंने कामना की कि कला का यह उत्सव आने वाली पीढय़िों तक इसी तरह आगे बढ़ता रहे।


