अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में नगर के साहित्यकारों ने भी लिया भाग

 

बिलासपुर. शहीद नन्द कुमार पटेल विश्वविद्यालत रायगढ़ में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य समापन हुआ।अंतिम दिन विमर्श और सृजन के संगम में कुलपति प्रो. विनय चौहान ने आयोजन को विश्वविद्यालय के लिए ‘मील का पत्थर’ सिद्ध किया।
प्रख्यात कवि अरुण कमल ने छठवें एवं सातवें तकनीकी सत्र की अध्यक्षता की। मुकुटधर पाण्डेय के अवदान को उन्होंने नमन किया एवं वक्ताओं के चिंतन को सराहा।
ब्रिटेन के प्रसिद्ध कथाकार तेजेंद्र शर्मा ने ‘गोद उतराई’ एवं डॉ.चन्द्रिका चौधरी ने अपनी कहानी का पाठ किया।
डॉ.मौना कौशिक, डॉ.सुषमा देवी, डॉ.सौरभ सराफ एवं डॉ. सीमा रानी प्रधान ने विषय विशेषज्ञ के रूप में सारगर्भित वक्तव्य दिए
अंतिम तकनीकी सत्र में डॉ.रमेश चंद्र श्रीवास्तव डॉ. हेमचंद्र पाण्डेय, प्रमोद झा, अंजनी तिवारी ‘सुधाकर’, अंकुर शुक्ला,डॉ.गजेन्द्र तिवारी एवं डॉ. रामायण प्रसाद टंडन ने विविध विधाओं और विमर्शों पर अपने विचार रखे।
समापन समारोह में अतिथियों को स्मृति चिह्न भेंटकर सम्मानित किया गया संयोजक डॉ.मीनकेतन प्रधान ने सभी सहयोगियों के प्रति आभार ज्ञापित किया।
शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय ,रायगढ़,विश्व हिन्दी अधिष्ठान न्यास (पंजी.) रायगढ़; केंद्रीय हिन्दी निदेशालय (शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली) तथा देवम फाउंडेशन (बुल्गारिया, यूरोप) के संयुक्त तत्वावधान में यह दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी ‘इक्कीसवीं सदी का हिन्दी साहित्य : विविध परिदृश्य’ का शनिवार, 31 अक्टूबर 2026 को गरिमामयी एवं भव्य समापन हुआ। 30 और 31 अक्टूबर तक चले इस साहित्यिक महाकुंभ में भारत के विभिन्न राज्यों सहित 7 देशों के शीर्ष साहित्यकारों, शिक्षाविदों, कुलपतियों, प्राध्यापकों एवं शोधार्थियों ने ऑफलाइन व ऑनलाइन माध्यम से सहभागिता कर समकालीन साहित्य के वैचारिक,भाषिक और शिल्पगत सरोकारों पर ऐतिहासिक मंथन किया।
संगोष्ठी के द्वितीय दिवस के छठवें एवं सातवें तकनीकी सत्रों की अध्यक्षता साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित देश के प्रख्यात कवि व विचारक अरुण कमल ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने छायावाद के प्रणेता पद्मश्री मुकुटधर पाण्डेय की पावन स्मृति और उनके युगांतरकारी साहित्यिक अवदान को श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए कहा कि रायगढ़ की यह भूमि सदैव से रचनात्मक ऊर्जा और साहित्यिक साधना की उर्वर धरा रही है। उन्होंने दोनों सत्रों में आमंत्रित विषय विशेषज्ञों द्वारा प्रस्तुत वक्तव्यों, अकादमिक तर्कों और विमर्श के स्तर की मुक्तकंठ से सराहना करते हुए कहा कि वक्ताओं ने समकालीन साहित्य की बारीकियों को अत्यंत प्रामाणिक रूप से रेखांकित किया है, जो हिन्दी आलोचना और साहित्य-चिंतन के उज्ज्वल भविष्य का स्पष्ट संकेत है।
द्वितीय दिवस के अकादमिक आकर्षण के रूप में ब्रिटेन से पधारे अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त वरिष्ठ कथाकार तेजेंद्र शर्मा ने अपनी अत्यंत चर्चित और संवेदनशील कहानी ‘गोद उतराई’ का प्रभावशाली पाठ किया जिसमें प्रवासी जीवन की जटिलताओं और मानवीय संवेदनाओं की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई। वहीं वरिष्ठ कथाकार डॉ. चन्द्रिका चौधरी ने भी अपनी कहानी का सस्वर पाठ क़िया।
द्वितीय दिवस के सत्रों में आमंत्रित विषय विशेषज्ञों ने समकालीन साहित्य के कई ज्वलंत एवं महत्वपूर्ण विषयों पर आधिकारिक व्याख्यान प्रस्तुत किए। डॉ. मौना कौशिक (बुल्गारिया) प्रवासी महिला साहित्यकारों के अवदान को रेखांकित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि सात समंदर पार रचने वाली लेखिकाओं ने वैश्विक धरातल पर भारतीय जीवन- मूल्यों और स्त्री-अस्मिता को नई रचनात्मक पहचान दी है।
डॉ. सुषमा देवी ने स्त्री- विमर्श के बदलते स्वरूप पर विचार रखते हुए कहा कि इक्कीसवीं सदी का स्त्री-लेखन प्रतिरोध के साथ-साथ आत्म निर्भरता, बौद्धिक चेतना और निर्णय लेने की स्वतंत्रता को यथार्थवादी धरातल पर अभिव्यक्त कर रहा है।
डॉ. सौरभ सराफ ने ‘भारत विभाजन और इक्कीसवीं सदी के हिन्दी उपन्यास’ विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि विभाजन केवल 1947 की राजनीतिक घटना नहीं बल्कि समकालीन उपन्यासों में विस्थापन, सांस्कृतिक स्मृति और निरंतर रिसते मानवीय घावों का जीवंत आख्यान है।
डॉ.सीमा रानी प्रधान ने कथेतर गद्य विधाओं (निबंध, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत, आत्मकथा) पर प्रकाश डालते हुए कहा कि समकालीन दौर में आत्मकथ्य परक गद्य विधाएँ पाठकों से सीधा संवाद स्थापित कर निरंतर अधिक लोकप्रिय हो रही हैं।
इसी क्रम में इक्कीसवीं सदी की विविध साहित्यिक विधाओं और विमर्शों पर केंद्रित अंतिम तकनीकी सत्र में विषय विशेषज्ञों ने अपने सारगर्भित विचार रखे,३ जिसमें विकलांग विमर्श पर डॉ. रमेश चंद्र श्रीवास्तव,जीवनी साहित्य पर डॉ. हेमचंद्र पाण्डेय, हिन्दी पत्रकारिता पर प्रमोद झा, व्यंग्य एवं डायरी लेखन पर अंजनी तिवारी ‘सुधाकर’, इक्कीसवीं सदी के साहित्य में मीडिया के प्रभाव पर अंकुर शुक्ला, विकलांग विमर्श पर, हिन्दी साहित्य पर विज्ञान और तकनीकी के प्रभाव पर डॉ. गजेन्द्र तिवारी तथा दलित एवं आदिवासी विमर्श पर डॉ. रामायण प्रसाद टंडन ने अपने आधिकारिक व्याख्यान प्रस्तुत किए। इस सत्र का धन्यवाद ज्ञापन डॉ. बी. के. भगत द्वारा किया गया।
उल्ले@खनीय है कि संगोष्ठी के प्रथम दिवस (30 अक्टूबर) का भव्य उद्घाटन ओ. पी. जिंदल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आर. डी. पाटीदार के मुख्य आतिथ्य एवं शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. विनय चौहान की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। मुख्य अतिथि प्रो. पाटीदार ने अपने उद्बोधन में रेखांकित किया कि साहित्य ही मनुष्यता का वास्तविक संवाहक है और रायगढ़ के लिए यह आयोजन ऐतिहासिक गौरव का विषय है। पहले दिन अरुण कमल द्वारा प्रसिद्ध कविता ‘धार’ का पाठ, कनाडा की प्रवासी साहित्यकार डॉ. स्नेह ठाकुर का वक्तव्य सह काव्य पाठ, केंद्रीय हिन्दी निदेशालय के सहायक निदेशक डॉ. दीपक पांडेय द्वारा योजनाओं की प्रस्तुति, प्रो. सुशील कुमार शर्मा द्वारा पूर्वोत्तर संस्कृति पर विमर्श, डॉ. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी द्वारा कविता पर चिंतन, प्रो. गौरी त्रिपाठी द्वारा समकालीन उपन्यास पर विश्लेषण तथा एक साथ 10 महत्वपूर्ण ग्रंथों का भव्य लोकार्पण प्रमुख आकर्षण रहे।
कुलपति प्रो. विनय चौहान ने बताया ‘मील का पत्थर’
संगोष्ठी के भव्य समापन सत्र के मुख्य अतिथि शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो. विनय चौहान रहे। अपने प्रेरणादायी उद्बोधन में कुलपति महोदय ने कहा कि यह दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी विश्वविद्यालय की अकादमिक यात्रा और संस्थागत प्रगति में एक ऐतिहासिक ‘मील का पत्थर’ साबित होगी। उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि विश्व विद्यालय का यह दृढ़ संकल्प है कि भविष्य में भी इस प्रकार की वृहद अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय संगोष्ठियों का निरंतर आयोजन किया जाए जिससे देश-विदेश के प्रख्यात मनीषी, साहित्यकार और शोधार्थी इस परिसर में आकर विद्यार्थियों और शोधार्थियों का मार्गदर्शन करते रहें।
सत्र के अंत में मंचासीन अतिथियों, देश-विदेश से पधारे वक्ताओं, समन्वयकों और शोधा र्थियों को विश्वविद्यालय एवं विश्व हिन्दी अधिष्ठान न्यास की ओर से शॉल, श्रीफल तथा स्मृति चिह्न (मोमेंटो) भेंटकर भावभीना सम्मान प्रदान किया गया।
समारोह के समापन पर विश्व हिन्दी अधिष्ठान न्यास (पंजी.) के संस्थापक-अध्यक्ष एवं संगोष्ठी के मुख्य संयोजक डॉ. मीनकेतन प्रधान ने सारगर्भित आभार व्यक्त किया। उन्होंने शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय प्रशासन, कुलपति प्रो. विनय चौहान, केंद्रीय हिन्दी निदेशालय, देवम फाउंडेशन (बुल्गारिया), देश-विदेश से पधारे समस्त शीर्ष साहित्यकारों, कुलपतियों, अतिथियों, शोधार्थियों तथा संचालन समिति के सभी सदस्यों के प्रति हृदय से कृतज्ञता ज्ञापित की। डॉ. प्रधान ने कहा कि सभी संस्थाओं और विद्वानों के निस्वार्थ अकादमिक सहयोग, निष्ठा और समर्पण से ही यह अंतरराष्ट्रीय आयोजन ऐतिहासिक रूप से सफल हो सका है। न्यास का यह प्रयास रहेगा कि इस संगोष्ठी के चयनित उत्कृष्ट शोध-पत्रों को शीघ्र ही एक स्तरीय ISBN युक्त ग्रंथ के रूप में प्रकाशित कर साहित्य जगत को सौंपा जाए।
संगोष्ठी में कुशल मंच संचालन डॉ. सौरभ सराफ, सहायक प्राध्यापक, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा किया गया। सौहार्दपूर्ण वातावरण के साथ दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का विधिवत समापन हुआ।

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