पितृ पक्ष सिखाता है कृतज्ञता और क्षमा : बीके स्वाति दीदी
बिलासपुर. प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय बिलासपुर की मुख्य शाखा, टेलीफोन एक्सचेंज रोड स्थित राजयोग भवन में पितृ पक्ष के अवसर पर विशेष भोग अर्पित किया गया। इस अवसर पर सेवाकेंद्र संचालिका बीके स्वाति दीदी ने पितृ पक्ष का आध्यात्मिक रहस्य समझाते हुए कहा कि किसी भी धार्मिक कार्य का महत्व केवल उस कार्य को करने में नहीं, बल्कि उसे किस श्रद्धा और किस भावना से किया जा रहा है, इसमें निहित होता है।
बीके स्वाति दीदी ने कहा कि श्राद्ध का अर्थ ही है—श्रद्धा, पूरे विश्वास, सम्मान और सच्चे भाव से किसी कार्य को करना। एक ही कार्य अलग-अलग भावनाओं से किया जाए तो उसका अनुभव और उसका फल भी अलग होता है। कई बार हम किसी परंपरा को केवल दिखावे के लिए निभाते हैं, कई बार केवल नियम प्रमाण करने के लिए करते हैं और कई बार वही कार्य बहुत गहरी श्रद्धा एवं भावनाओं के साथ करते हैं। जब कोई कार्य सच्ची भावना से किया जाता है, तभी उसका आध्यात्मिक महत्व बढ़ जाता है।
उन्होंने पितृ पक्ष से जुड़ी कर्ण की कथा का उल्लेख करते हुए कहा कि कर्ण ने जीवन में बहुत दान किया, लेकिन पूर्वजों के निमित्त अन्न दान नहीं किया था। कथा के माध्यम से यही संदेश मिलता है कि दान के साथ भावना और कृतज्ञता भी आवश्यक है। केवल बाहरी कर्मकांड नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपी श्रद्धा ही उसे सार्थक बनाती है।
उन्होंने कहा कि वास्तव में आत्मा अविनाशी है, शरीर नश्वर है। हमारे जो बड़े आज शरीर रूप में हमारे बीच नहीं हैं, वे आत्मा के रूप में अपनी यात्रा पर हैं। इसलिए पितृ पक्ष में उन्हें भय या चिंता के साथ नहीं, बल्कि प्रेम, सम्मान, कृतज्ञता और शुभभावना के साथ याद करना चाहिए।
बीके स्वाति दीदी ने धुंधकारी की कथा को आध्यात्मिक दृष्टि से समझाते हुए कहा कि धुंधकारी नाम अपने आप में एक गहरा संदेश देता है। जब अविनाशी आत्मा विकारों के वशीभूत हो जाती है तो उसकी मन-बुद्धि धूमिल हो जाती है और सत्य का मार्ग दिखाई नहीं देता। लेकिन जब उसे सत्य का संग मिलता है, सही ज्ञान और श्रेष्ठ संगति प्राप्त होती है तो उसके जीवन में परिवर्तन आता है और वह भी सही मार्ग पर चलने लगती है। इस प्रकार धुंधकारी की कथा केवल किसी व्यक्ति की मुक्ति की कहानी नहीं, बल्कि हमारे भीतर के अज्ञान और विकारों से मुक्ति का संदेश भी देती है।
उन्होंने कहा कि पितृ पक्ष हमें अपने भीतर झांकने का अवसर देता है। हमारे जो बड़े होकर चले गए हैं, यदि उनसे जीवन में किसी प्रकार की भूल हुई हो या हमारी ओर से उनके प्रति कोई कमी रह गई हो तो मन से क्षमा मांगें और उन्हें धन्यवाद दें। वहीं यदि हमारे मन में किसी व्यक्ति के प्रति कोई पुरानी शिकायत, नाराजगी या दुख जमा है तो उसे भी छोड़कर उस व्यक्ति को दिल से माफ कर दें। क्योंकि किसी को मन में पकड़े रखना स्वयं के मन पर बोझ रखना है।
बीके स्वाति दीदी ने कहा कि पितृ पक्ष में एक ओर हम अपने पूर्वजों को श्रद्धा से याद करें, वहीं दूसरी ओर अपने मन को भी हल्का करें। क्षमा, कृतज्ञता और शुभभावना के ये तीन संकल्प जीवन को नई शांति दे सकते हैं।
कार्यक्रम में विशेष भोग अर्पित किया गया तथा उपस्थित भाई-बहनों ने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और शुभभावना के साथ योग-साधना की। वातावरण में आध्यात्मिक शांति एवं भावनात्मक आत्मीयता का विशेष अनुभव रहा।
बीके स्वाति दीदी ने अंत में कहा कि “सच्ची श्रद्धांजलि यही है कि हम अपने पूर्वजों के अच्छे संस्कारों को अपने जीवन में धारण करें, उनके प्रति धन्यवाद रखें, अपनी भूलों के लिए क्षमा मांगें और मन में किसी के प्रति कोई बोझ हो तो उसे क्षमा करके स्वयं भी हल्के हो जाएं।”


