मजदूरों की आवाज पूरी दुनिया में उठाई

1 मई  दिवस यानी कामगारों के अधिकार, सम्मान और उनके योगदान का दिन, लेकिन क्या आप जानते हैं कि मजदूरों के संघर्ष का प्रतीक 1 मई को कही क्यों माना गया. इसके तार जुड़े हैं 19 वीं सदी से. सदी के अंत तक कुछ ऐसा हुआ जिसने मजदूरों की आवाज पूरी दुनिया में उठाई.
ये औद्योगिक क्रांति के बाद का दौर था. उस वक्त मजदूरों के काम के घंटे तय नहीं थे. कोई उनसे 12 घंटे काम कराता था तो कहीं मजदूरों को 16 या उससे ज्यादा घंटे तक काम करना पड़ता था. हालात खराब थे. न तो उन्हें पर्याप्त आराम दिया जा रहा था, न ही पर्याप्त मजदूरी. मजदूरों ने अपने खिलाफ हो रहे इस संघर्ष के लिए आवाज उठाई. 8 घंटे काम, 8 घंटे आराम और 8 घंटे अपने लिए का नारा दिया और जिम्मेदारों तक इस बात को पहुंचाने के लिए 1 मई की तारीख ही चुनी.
उस समय मजदूरों का सबसे बड़ा संगठन अमेरिका का फेडरेशन ऑफ ऑर्गनाइज्ड ट्रेड्स एंड लेबर यूनियन थी. बाद में इसे ही अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर नाम दिया गया. संगठन ने फैसला किया कि 1 मई 1886 से आठ घंटे काम को कानूनी तौर पर लागू किया जाए

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